कौन हैं छठी मइया और कैसे शुरु हुई इनकी पूजा?
भारत के पावन त्योहारों में छठ पूजा का विशेष महत्व है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मइया की आराधना को समर्पित है, जिसमें भक्त नदी या तालाब के किनारे खड़े होकर अस्ताचलगामी और उदयमान सूर्य को अर्घ्य देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि छठी मइया कौन हैं और उनकी पूजा की शुरुआत कैसे हुई? आइए जानते हैं इससे जुड़ी रोचक कथा और मान्यताएं।
छठी मइया का स्वरूप और महत्व
छठी मइया को सूर्य देव की बहन माना जाता है। इन्हें षष्ठी देवी या स्कंद माता के नाम से भी पुकारा जाता है। पुराणों के अनुसार, ये संतानों की रक्षक और समृद्धि की दाता हैं। इनका स्वरूप अत्यंत कोमल और कृपालु है:
- वस्त्र: लाल या पीले रंग की साड़ी
- आसन: कमल के फूल पर विराजमान
- प्रतीक: जल से भरा कलश और नारियल
छठ पूजा की पौराणिक कथा
रामायण काल से जुड़ी मान्यता
मान्यता है कि भगवान राम और माता सीता ने अयोध्या लौटने के बाद कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना की थी। इसी दिन से छठ पर्व की शुरुआत हुई:
- रामराज्य की स्थापना के बाद माता सीता ने सूर्य देव की आराधना की
- छठी मइया प्रकट हुईं और उन्होंने सीता को आशीर्वाद दिया
- तभी से यह पर्व राजपरिवार से जनसामान्य तक पहुँचा
महाभारत की कथा
एक अन्य मान्यता के अनुसार, कर्ण (सूर्यपुत्र) ने छठ व्रत का प्रारंभ किया था:
- कर्ण प्रतिदिन सूर्य को जल अर्पित करते थे
- छठी मइया की कृपा से ही वे महान दानवीर बने
- आज भी छठ में कर्ण की पूजा-पद्धति का अनुसरण किया जाता है
छठ पूजा का ऐतिहासिक महत्व
प्राचीन काल से ही सूर्योपासना का विशेष महत्व रहा है। वेदों में भी सूर्य षष्ठी व्रत का उल्लेख मिलता है:
- ऋग्वेद में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है
- मध्यकाल में यह पर्व बिहार-झारखंड में विशेष लोकप्रिय हुआ
- आधुनिक युग में पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
छठ पर्व के पीछे केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कारण भी हैं:
- सूर्यास्त और सूर्योदय का समय मानव शरीर के लिए विशेष फलदायी
- नदी के जल में खड़े होने से पैरों के एक्यूपंक्चर पॉइंट्स सक्रिय होते हैं
- प्रसाद में मौजूद पोषक तत्व शरीर को ऊर्जा देते हैं
छठ पूजा की विधि
यह चार दिवसीय पर्व है जिसमें प्रत्येक दिन की अलग महिमा है:
1. नहाय-खाय (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी)
- स्नान कर शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण किया जाता है
- कद्दू-चने की दाल और चावल का प्रसाद बनता है
2. खरना (पंचमी तिथि)
- व्रती दिनभर उपवास रखकर शाम को खीर का प्रसाद खाते हैं
- यह प्रसाद गुड़ और नये चावल से बनाया जाता है
3. संध्या अर्घ्य (षष्ठी तिथि)
- डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है
- बांस की टोकरी में ठेकुआ, फल और नारियल रखकर पूजा की जाती है
4. उषा अर्घ्य (सप्तमी तिथि)
- उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन होता है
- इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं
छठी मइया के प्रसाद का महत्व
छठ पूजा का प्रसाद बनाने में विशेष शुद्धता का ध्यान रखा जाता है:
- ठेकुआ: गुड़ और आटे से बना मुख्य प्रसाद
- फल: केला, नारियल, गन्ना और मूली विशेष रूप से चढ़ाए जाते हैं
- मिठाई: खीर, पूरी और चावल का प्रयोग होता है
प्रसाद बनाने की विशेषताएं
- सभी सामग्री नयी और शुद्ध होनी चाहिए
- मिट्टी के चूल्हे पर ही भोजन पकाया जाता है
- पूजा तक प्रसाद को छुआ नहीं जाता
छठ पूजा की विशेष मान्यताएं
इस पर्व से जुड़ी कुछ अनूठी मान्यताएं हैं जो इसे और भी खास बनाती हैं:
- निर्जला व्रत: व्रती 36 घंटे तक बिना जल ग्रहण किए रहते हैं
- परिवारिक एकता: पूरा परिवार मिलकर पूजा करता है
- प्रकृति पूजा: सूर्य, जल और पृथ्वी तीनों की आराधना होती है
छठी मइया का आशीर्वाद
मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से छठी मइया की आराधना करता है:
- संतान सुख की प्राप्ति होती है
- पारिवारिक समृद्धि बढ़ती है
- सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं
निष्कर्ष
छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, समर्पण और शुद्धता का प्रतीक है। छठी मइया की कृपा से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। यह पर्व हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीने की प्रेरणा देता है। आइए, हम सभी इस पावन पर्व पर छठी मइया के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
छठी मइया की जय! सूर्य देव की जय!
