रामायण की अनेकों घटनाएँ हमें जीवन के गहरे संदेश देती हैं। ऐसी ही एक प्रसंग है लंका दहन का, जहाँ हनुमान जी ने रावण की सारी लंका को अग्नि के हवाले कर दिया, परंतु विभीषण का भवन अछूता रहा। आखिर क्यों? आइए, इस पावन प्रसंग को विस्तार से जानें।
लंका दहन की पृष्ठभूमि
जब हनुमान जी सीता माता की खोज में लंका पहुँचे, तो उन्होंने रावण के अहंकार और अधर्म को देखा। माता सीता को बलपूर्वक बंदी बनाए रखने के कारण हनुमान जी ने लंका को जलाने का निर्णय लिया।
हनुमान जी की अग्नि लीला
- रावण के सैनिकों ने हनुमान जी की पूँछ में आग लगा दी।
- इसी अग्नि को हनुमान जी ने अपनी शक्ति से विशाल कर लिया।
- उन्होंने पूरी लंका में आग लगा दी, पर विभीषण का महल सुरक्षित रहा।
विभीषण का भवन बचने का रहस्य
विभीषण रावण के छोटे भाई थे, किंतु धर्म के मार्ग पर चलते थे। उन्होंने रावण को माता सीता को वापस लौटाने की सलाह दी थी। यही कारण था कि हनुमान जी ने उनके भवन को नहीं जलाया।
धर्म की विजय
- विभीषण का चरित्र निष्ठा और सदाचार का प्रतीक था।
- हनुमान जी ने धर्म और अधर्म में अंतर समझा।
- इस घटना से सीख मिलती है कि ईश्वर की कृपा सदैव धर्म के पक्ष में होती है।
श्रीराम और विभीषण का मिलन
बाद में, विभीषण ने रावण का साथ छोड़कर श्रीराम की शरण ली। श्रीराम ने उन्हें लंका का राजा बनाया, जो दर्शाता है कि सत्य की हमेशा विजय होती है।
जीवन प्रेरणा
- धर्म का मार्ग चुनें, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत हों।
- अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है।
- हनुमान जी की यह लीला हमें न्याय और विवेक का संदेश देती है।
रामायण का यह प्रसंग सिखाता है कि ईश्वर उन्हीं की रक्षा करते हैं, जो धर्म के पथ पर अडिग रहते हैं। विभीषण का भवन न जलना, धर्म की अजेयता का प्रतीक है।
“जो धर्म के मार्ग पर चलता है, उस पर प्रभु की कृपा सदैव बनी रहती है।”
इस कथा से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि सत्य और न्याय का साथ देना ही जीवन का सर्वोत्तम मार्ग है।
