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बैकुंठ चतुर्दशी: भगवान शिव विष्णुजी को सौंपते हैं सृष्टि का भार

Published September 28, 2025
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4 Min Read

पावन पर्व की महिमा

बैकुंठ चतुर्दशी हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र त्योहार है, जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की अद्भुत लीला का साक्षी बना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव, भगवान विष्णु को सृष्टि का भार सौंपते हैं और स्वयं विश्राम के लिए चले जाते हैं। यह पर्व भक्तों के लिए मोक्ष प्राप्ति का सुनहरा अवसर प्रदान करता है।

Contents
पावन पर्व की महिमाबैकुंठ चतुर्दशी का पौराणिक महत्वशिव-विष्णु का अद्भुत संवादविष्णु जी का बैकुंठ लोक में प्रवेशबैकुंठ चतुर्दशी व्रत विधिव्रत का संकल्पपूजन विधिदान का महत्वबैकुंठ चतुर्दशी की विशेष कथाएँराजा रंतिदेव की कथाधुन्धुली नामक व्यापारी की कथाइस पर्व का आध्यात्मिक संदेशनिष्कर्ष: पावन अवसर का सदुपयोग

बैकुंठ चतुर्दशी का पौराणिक महत्व

शिव-विष्णु का अद्भुत संवाद

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु ने भगवान शिव से सृष्टि के संचालन का भार लेने की इच्छा प्रकट की। भगवान शिव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी के दिन सृष्टि का दायित्व विष्णु जी को सौंप दिया। इसी दिन से यह पर्व “बैकुंठ चतुर्दशी” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

विष्णु जी का बैकुंठ लोक में प्रवेश

इस दिन भगवान विष्णु बैकुंठ धाम के द्वार खोलते हैं और भक्तों को अपने धाम में स्थान देते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत, पूजा एवं दान करने वाले भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

बैकुंठ चतुर्दशी व्रत विधि

व्रत का संकल्प

इस पावन व्रत को करने के लिए सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। फिर संकल्प लें:

“मम सर्वपापक्षयपूर्वक श्रीहरिप्रसादार्थं बैकुंठचतुर्दशीव्रतमहं करिष्ये।”

पूजन विधि

  • सर्वप्रथम गंगाजल से घर को शुद्ध करें।
  • तुलसी के पौधे के पास विष्णु जी की मूर्ति या शालिग्राम स्थापित करें।
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें।
  • चंदन, फूल, धूप-दीप से पूजा करें।
  • भगवान विष्णु के “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।

दान का महत्व

इस दिन अन्न, वस्त्र, दीपक, तुलसी का पौधा या गरीबों को भोजन कराने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

बैकुंठ चतुर्दशी की विशेष कथाएँ

राजा रंतिदेव की कथा

पुराणों में वर्णित है कि राजा रंतिदेव ने इस व्रत को करके भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त की थी। उन्होंने निराहार रहकर पूरे दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया, जिससे प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दर्शन दिए।

धुन्धुली नामक व्यापारी की कथा

एक अन्य कथा के अनुसार, धुन्धुली नामक एक पापी व्यापारी ने इस व्रत को करके अपने सभी पापों से मुक्ति पाई और अंत में बैकुंठ धाम को प्राप्त हुआ।

इस पर्व का आध्यात्मिक संदेश

बैकुंठ चतुर्दशी हमें सिखाती है कि ईश्वर की भक्ति और सच्चे मन से किया गया व्रत हमें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिला सकता है। यह दिन हमें अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भगवान के प्रति समर्पण का संदेश देता है।

निष्कर्ष: पावन अवसर का सदुपयोग

बैकुंठ चतुर्दशी का यह पुण्य दिन हमारे लिए आत्मशुद्धि और भक्ति का सर्वोत्तम अवसर है। आइए, इस दिन पूरे विधि-विधान से व्रत करके भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करें और अपने जीवन को धन्य बनाएँ।

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥”

(भगवद्गीता 4.7)

भगवान विष्णु की कृपा सदैव आप पर बनी रहे!

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