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Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2025 कब है शुभ मुहूर्त पूजन विधि

Published October 25, 2025
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4 Min Read

हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए किया जाता है। द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी साल के सभी संकष्टी व्रतों में से एक प्रमुख व्रत है, जो माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन व्रत रखकर भक्त गणपति की आराधना करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

Contents
Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2025: तिथि और शुभ मुहूर्तद्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्वपूजन विधिसामग्रीविधिमंत्र और आरतीगणेश मंत्रगणेश आरतीकथा: द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थीव्रत के लाभ

Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2025 30 जनवरी, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन चंद्रोदय के समय व्रत का पारण किया जाता है। आइए जानते हैं शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय:

  • चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 29 जनवरी 2025, रात 11:58 बजे
  • चतुर्थी तिथि समाप्त: 30 जनवरी 2025, रात 11:18 बजे
  • चंद्रोदय समय (लगभग): शाम 7:45 बजे (स्थान के अनुसार भिन्न हो सकता है)
  • पूजा का शुभ मुहूर्त: सायंकाल 5:30 बजे से 7:30 बजे तक

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्व

संकष्टी चतुर्थी का नाम “द्विजप्रिय” इसलिए पड़ा क्योंकि इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से ब्राह्मणों (द्विज) को विशेष प्रसन्नता होती है। यह व्रत संकटों को दूर करने वाला माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन व्रत रखकर गणपति की उपासना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

पूजन विधि

सामग्री

  • गणेश जी की मूर्ति या चित्र
  • लाल चंदन, फूल, दूर्वा घास
  • मोदक, लड्डू, फल
  • धूप, दीप, अगरबत्ती
  • गंगाजल और तिलक सामग्री

विधि

  1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें।
  3. गणेश जी की मूर्ति स्थापित करें और उन्हें लाल चंदन लगाएं।
  4. दूर्वा घास, फूल और मोदक अर्पित करें।
  5. धूप-दीप जलाकर आरती करें।
  6. संकष्टी चतुर्थी की कथा सुनें या पढ़ें।
  7. चंद्रोदय के बाद व्रत का पारण करें।

मंत्र और आरती

गणेश मंत्र

“ॐ गं गणपतये नमः” का जाप करें। इसके अलावा, निम्न मंत्र भी पढ़ सकते हैं:

“वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥”

गणेश आरती

पूजा के अंत में निम्न आरती गाएं:

“जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥”

कथा: द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी

पुराणों में वर्णित एक कथा के अनुसार, एक बार एक गरीब ब्राह्मण ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूरी श्रद्धा से किया। उसने गणेश जी की आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया। भगवान गणेश ने प्रसन्न होकर उसकी गरीबी दूर की और उसे धन-धान्य से संपन्न कर दिया। इसीलिए इस चतुर्थी को “द्विजप्रिय” कहा जाता है, क्योंकि यह ब्राह्मणों के लिए विशेष फलदायी है।

व्रत के लाभ

  • संकटों से मुक्ति मिलती है।
  • धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है।
  • विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती है।
  • कुंडली के दोष दूर होते हैं।

द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2025 का व्रत रखकर भक्त भगवान गणेश की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। इस दिन पूजा-अर्चना करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। आप सभी को इस पावन व्रत की हार्दिक शुभकामनाएं!

ध्यान दें: चंद्रोदय समय आपके स्थान के अनुसार अलग हो सकता है, अतः स्थानीय पंचांग या ज्योतिषी से जांच लें।

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