भारतीय दर्शन और अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य का जन्मदिवस हर साल वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। 2025 में यह पर्व 2 मई को पड़ रहा है। उनकी जीवन यात्रा न केवल आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए प्रेरणा है, बल्कि उनके द्वारा स्थापित चार धाम और चार मठ आज भी सनातन धर्म की रीढ़ हैं।
इस लेख में हम जानेंगे:
- कैसे एक साधारण बालक शंकर से शंकराचार्य बना?
- चार धाम की स्थापना के पीछे छिपा रहस्य
- उनके द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथों का महत्व
बालक शंकर का अवतरण और अलौकिक बुद्धिमत्ता
केरल के कालड़ी गाँव में जन्म
आदि शंकराचार्य का जन्म लगभग 788 ईस्वी में केरल के कालड़ी गाँव में हुआ था। माता आर्यम्बा और पिता शिवगुरु ने इन्हें भगवान शिव का वरदान माना, क्योंकि वर्षों की तपस्या के बाद उन्हें यह पुत्र प्राप्त हुआ था।
बाल्यकाल से ही प्रखर प्रतिभा
- 3 वर्ष की आयु तक संस्कृत और वेदों का ज्ञान
- 5 वर्ष में ही गुरुकुल जाने की इच्छा
- 8 वर्ष की उम्र में सन्यास लेने का निर्णय
सन्यास की प्रेरणा और गुरु की खोज
माता की अनुमति और नर्मदा तट पर गोविंदपाद से मुलाकात
एक दिन जब शंकर नदी में स्नान कर रहे थे, तो एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया। उन्होंने माता से कहा:
“माता, अगर आप मुझे सन्यास लेने की अनुमति दें, तो यह जीव मुझे छोड़ देगा।”
माता ने हाँ कही और इस तरह 8 वर्ष की आयु में ही शंकर ने सन्यास ले लिया।
गोविंदपाद से दीक्षा और अद्वैत का ज्ञान
नर्मदा तट पर उन्हें अपने गुरु गोविंदपाद मिले, जिन्होंने उन्हें अद्वैत वेदांत की शिक्षा दी। गुरु ने कहा:
“तत्वमसि शंकर” (तू वही है, हे शंकर!)
भारत भ्रमण और धर्म का पुनरुत्थान
मंडन मिश्रा से शास्त्रार्थ
शंकराचार्य ने मंडन मिश्रा (एक प्रसिद्ध मीमांसक) को शास्त्रार्थ में हराकर उन्हें अपना शिष्य बनाया। इस विजय के बाद मिश्रा का नाम सुरेश्वराचार्य पड़ा।
चार मठों की स्थापना
- शृंगेरी मठ (दक्षिण) – यजुर्वेद
- द्वारका मठ (पश्चिम) – सामवेद
- ज्योतिर्मठ (उत्तर) – अथर्ववेद
- गोवर्धन मठ (पूर्व) – ऋग्वेद
चार धाम की स्थापना: भारत की आध्यात्मिक सीमाओं की रक्षा
चार धामों का महत्व
शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों में चार धाम स्थापित किए, जो आज भी हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थ स्थल हैं:
| धाम | स्थान | देवता |
|---|---|---|
| बद्रीनाथ | उत्तराखंड | भगवान विष्णु |
| रामेश्वरम | तमिलनाडु | भगवान शिव |
| द्वारका | गुजरात | भगवान कृष्ण |
| पुरी | ओडिशा | भगवान जगन्नाथ |
चार धाम के पीछे का रहस्य
शंकराचार्य ने इन चार धामों को स्थापित करके:
- भारत की आध्यात्मिक एकता को मजबूत किया
- वैदिक ज्ञान के प्रसार के लिए केंद्र बनाए
- सनातन धर्म को विखंडन से बचाया
आदि शंकराचार्य की अमर विरासत
प्रमुख रचनाएँ
- विवेकचूड़ामणि – अद्वैत दर्शन का प्रमुख ग्रंथ
- भज गोविंदम – भक्ति और ज्ञान का अनुपम संगम
- सौंदर्य लहरी – देवी भक्ति पर आधारित
32 वर्ष की आयु में महासमाधि
कहा जाता है कि केदारनाथ में 32 वर्ष की आयु में शंकराचार्य ने महासमाधि ले ली। उनका छोटा सा जीवनकाल ही भारतीय दर्शन के लिए अमूल्य साबित हुआ।
शंकराचार्य जयंती का संदेश
आदि शंकराचार्य ने सिखाया कि “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” (ब्रह्म ही सत्य है, जगत माया है)। उनकी जयंती हमें यह याद दिलाती है कि:
- ज्ञान और भक्ति का संतुलन ही मोक्ष का मार्ग है
- धर्म की रक्षा के लिए एकता आवश्यक है
- सत्य की खोज ही मनुष्य का परम लक्ष्य होना चाहिए
ॐ नमः शिवाय

