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आरती है तारती पूजा के बाद की आरती का महत्व और नियम

आरती है तारती जानें पूजा के बाद की जाने वाली ईश्वर की आरती का महत्व और नियम सही विधि से आरती करने के फायदे

Published July 2, 2026
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4 Min Read

भारतीय संस्कृति में पूजा-अर्चना के बाद आरती का विशेष स्थान है। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भक्ति के समुद्र में डूबकर ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। आरती के दीपक की लौ मन के अंधकार को मिटाकर आत्मिक प्रकाश फैलाती है। इस लेख में जानेंगे कि आरती क्यों है “तारती” (संकटों से पार लगाने वाली), इसका महत्व, सही विधि और वो गहरे रहस्य जो हर भक्त को जानने चाहिए।

Contents
आरती का अर्थ और मूल भावनाआरती का आध्यात्मिक महत्व: क्यों है यह अनिवार्य?1. पंचतत्वों का संतुलन2. भक्त और भगवान के बीच आत्मिक संवादआरती करने की सही विधि: शास्त्रोक्त नियम1. आरती सामग्री तैयार करें2. आसन और दिशा3. मंत्रों का उच्चारणवैज्ञानिक दृष्टिकोण: आरती के छुपे लाभसावधानियाँ: इन गलतियों से बचेंनिष्कर्ष: आरती है तारने वाली

आरती का अर्थ और मूल भावना

संस्कृत शब्द “आरात्रिक” से बना ‘आरती’ शब्द दो भावों को समेटे हुए है:

  • आरा: संकट या अंधकार
  • त्रिक: निवारण करने वाला

अर्थात, जो हमें भवसागर के संकटों से पार उतारे। आरती में दीपक, घंटी, शंख, फूल और चंवर के माध्यम से ईश्वर की स्तुति की जाती है।

आरती का आध्यात्मिक महत्व: क्यों है यह अनिवार्य?

1. पंचतत्वों का संतुलन

आरती में प्रयुक्त सामग्री प्रकृति के पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) को समर्पित होती है:

  • दीपक (अग्नि): अज्ञानता को जलाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है।
  • फूल (पृथ्वी): मन की शुद्धता का प्रतीक।
  • शंख ध्वनि (आकाश): दिव्य कंपन पैदा करती है।

2. भक्त और भगवान के बीच आत्मिक संवाद

जैसे दीपक की लौ ऊपर की ओर उठती है, वैसे ही भक्त का प्रेम ईश्वर तक पहुँचता है। श्रीमद्भागवत गीता (9.26) में भगवान कहते हैं:

“पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥”

(भक्ति से अर्पित पत्ता, फूल, फल या जल मैं प्रेमपूर्वक स्वीकार करता हूँ।)

आरती करने की सही विधि: शास्त्रोक्त नियम

1. आरती सामग्री तैयार करें

  • दीपक: पीतल/चाँदी का, घी या तिल के तेल से जलाएँ।
  • कपूर: शुद्धता का प्रतीक।
  • फूल: ताज़े, भगवान के प्रिय (जैसे तुलसी, कमल)।

2. आसन और दिशा

पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके खड़े हों। दीपक को भगवान के चरणों से शीर्ष तक घुमाएँ (कम से कम 3 या 5 परिक्रमाएँ)।

3. मंत्रों का उच्चारण

इन मंत्रों के साथ आरती करें:

“ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥”

या फिर देवी के लिए:

“सर्वमंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी, नारायणी नमोऽस्तु ते॥”

वैज्ञानिक दृष्टिकोण: आरती के छुपे लाभ

  • सकारात्मक ऊर्जा: घंटी की ध्वनि वातावरण से नकारात्मक तरंगें दूर करती है।
  • आरोग्य लाभ: घी के दीपक से हवा शुद्ध होती है, सांस संबंधी रोग कम होते हैं।
  • मानसिक शांति: आरती के मंत्र मन को एकाग्र करते हैं।

सावधानियाँ: इन गलतियों से बचें

  • कभी भी खाली हाथ आरती न करें (फूल या अक्षत अवश्य रखें)।
  • दीपक बुझने से पहले ही आरती पूरी कर लें।
  • आरती के बाद प्रसाद सभी उपस्थित लोगों में वितरित करें।

निष्कर्ष: आरती है तारने वाली

आरती सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने का सरलतम मार्ग है। जब हम पूरी श्रद्धा से दीपक जलाते हैं, तो वह हमारे अंदर के अहंकार को जला देता है और प्रेम का दीया जगा देता है। तुलसीदास जी ने सच कहा है:

“बिनु आरती भवन नहिं, ज्यों बिनु तेल दीप।
बिनु गुरु ज्ञान न होत है, ज्यों बिनु नाव नदीप॥”

आज ही संकल्प लें – नियमित आरती करें और जीवन के हर अंधकार को दिव्य ज्योति से मिटा दें।

ध्यान दें: आरती के मंत्रों का सही उच्चारण करें। संदेह हो तो किसी ज्ञानी से पूछें।

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