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देवउठनी एकादशी 2025 तुलसी शालीग्राम विवाह महत्व

देवउठनी एकादशी 2025 में तुलसी और शालीग्राम के विवाह का महत्व जानें। इस पवित्र परंपरा की कथा, महत्व और पूजा विधि समझें, जो भक्तों के लिए विशेष आशीर्वाद लाती है।

Published July 2, 2026
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4 Min Read

देवउठनी एकादशी 2025: जानिए क्यों किया जाता है तुलसी और शालीग्राम का विवाह

हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है। इनमें से देवउठनी एकादशी (जिसे देवोत्थान एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं) का विशेष महत्व है। यह वह पावन दिन है जब भगवान विष्णु चार माह की योगनिद्रा के बाद जागते हैं। इसी दिन तुलसी और शालीग्राम का विवाह भी धूमधाम से मनाया जाता है। आइए, जानते हैं कि यह परंपरा क्यों शुरू हुई और इसका आध्यात्मिक अर्थ क्या है।

Contents
देवउठनी एकादशी 2025: जानिए क्यों किया जाता है तुलसी और शालीग्राम का विवाहदेवउठनी एकादशी 2025: तिथि और महत्वक्या है देवउठनी एकादशी का महत्व?तुलसी और शालीग्राम विवाह की पौराणिक कथावृंदा का श्राप और तुलसी का रूपतुलसी-शालीग्राम विवाह की विधिविशेष सामग्रीतुलसी-शालीग्राम विवाह का आध्यात्मिक अर्थदेवउठनी एकादशी के अन्य रीति-रिवाजनिष्कर्ष

देवउठनी एकादशी 2025: तिथि और महत्व

सन 2025 में देवउठनी एकादशी 31 अक्टूबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन भक्त विष्णु जी की पूजा-अर्चना करके उन्हें जगाते हैं और तुलसी-शालीग्राम के विवाह का आयोजन करते हैं। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आता है।

क्या है देवउठनी एकादशी का महत्व?

  • इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं और सृष्टि का पालन-पोषण फिर से प्रारंभ करते हैं।
  • तुलसी-शालीग्राम विवाह से घर में सुख-समृद्धि आती है और पापों का नाश होता है।
  • इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा पितृदोष से मुक्ति मिलती है।

तुलसी और शालीग्राम विवाह की पौराणिक कथा

शास्त्रों में तुलसी को विष्णुप्रिया कहा गया है। उनका शालीग्राम (भगवान विष्णु का पत्थर रूप) से विवाह क्यों किया जाता है, इसकी एक रोचक कथा है:

वृंदा का श्राप और तुलसी का रूप

पुराणों के अनुसार, दैत्यराज जालंधर की पत्नी वृंदा (तुलसी का पूर्व जन्म) अत्यंत पतिव्रता थी। उसके सतीत्व के बल पर जालंधर अजेय हो गया। तब भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण कर वृंदा का सतीत्व भंग किया। जब वृंदा को सच्चाई पता चली, तो उसने विष्णु जी को पत्थर (शालीग्राम) बन जाने का श्राप दिया। बाद में, विष्णु जी ने वृंदा को वरदान दिया कि वह तुलसी के रूप में पूजी जाएगी और हर साल उनका शालीग्राम से विवाह होगा।

तुलसी-शालीग्राम विवाह की विधि

इस विवाह को करने के लिए निम्न विधि अपनाई जाती है:

  • सुबह स्नान करके घर के मंदिर को फूल-मालाओं से सजाएं।
  • तुलसी के पौधे को साड़ी पहनाकर दुल्हन के रूप में सजाएं तथा शालीग्राम को वस्त्र और चंदन से सजाएं।
  • विवाह के मंत्रों के साथ फेरे लें: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें।
  • तुलसी की डाल को शालीग्राम के साथ बांधकर मिष्ठान्न का भोग लगाएं।
  • अंत में आरती करके ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दें।

विशेष सामग्री

  • तुलसी का पौधा (जिसमें जड़ हो)
  • शालीग्राम शिला
  • लाल चुनरी, सिंदूर, मेहंदी
  • मिठाई और फल

तुलसी-शालीग्राम विवाह का आध्यात्मिक अर्थ

यह विवाह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक संदेश देता है:

  • तुलसी (भक्ति का प्रतीक) और शालीग्राम (भगवान विष्णु) का मिलन जीवात्मा और परमात्मा के संयोग को दर्शाता है।
  • तुलसी का पौधा हमें प्रकृति से जोड़ता है, जबकि शालीग्राम आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है।
  • इस विवाह से यह संदेश मिलता है कि भक्ति के बिना ईश्वर की प्राप्ति असंभव है।

देवउठनी एकादशी के अन्य रीति-रिवाज

इस दिन निम्न परंपराएं भी निभाई जाती हैं:

  • दीपदान: घर-मंदिर में दीप जलाकर भगवान विष्णु का आह्वान किया जाता है।
  • व्रत कथा: एकादशी की कथा सुनने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • दान-पुण्य: गरीबों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा देना शुभ माना जाता है।

निष्कर्ष

देवउठनी एकादशी भक्ति और संस्कृति का अद्भुत संगम है। तुलसी-शालीग्राम विवाह न सिर्फ हमें पौराणिक कथाओं से जोड़ता है, बल्कि प्रकृति और ईश्वर के बीच के पवित्र रिश्ते को भी दर्शाता है। इस व्रत को श्रद्धा से करने पर भगवान विष्णु की कृपा सदैव बनी रहती है। आइए, इस बार 31 अक्टूबर 2025 को पूरे विधि-विधान से यह पावन पर्व मनाएं और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करें।

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