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सिक्ख गुरू बनने के लिए अंगद को देनी पड़ी सात कठिन परीक्षाएं
सिक्ख धर्म के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी, ने गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं को आगे बढ़ाने और सिक्ख पंथ को मजबूती प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुरु नानक देव जी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाने से पहले सात कठिन परीक्षाओं से गुजरने के लिए कहा था? यह कहानी न केवल भक्ति और समर्पण की है, बल्कि यह हमें सिखाती है कि सच्चा गुरु बनने के लिए कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
गुरु अंगद देव जी का प्रारंभिक जीवन
गुरु अंगद देव जी का जन्म 31 मार्च 1504 को हरिके, पंजाब में हुआ था। उनका मूल नाम भाई लहणा जी था। वह एक साधारण गृहस्थ थे और व्यापार करते थे। लेकिन जब उन्होंने गुरु नानक देव जी के उपदेश सुने, तो उनका हृदय बदल गया। उन्होंने गुरु नानक देव जी के चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया और उनके शिष्य बन गए।
सात कठिन परीक्षाएं
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी की भक्ति और समर्पण को परखने के लिए सात कठिन परीक्षाएं लीं। इन परीक्षाओं से गुजरने के बाद ही उन्हें गुरु अंगद देव जी के रूप में स्वीकार किया गया।
पहली परीक्षा: भक्ति की परख
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी से कहा कि वह उनके लिए एक कटोरे में गर्म दूध लेकर आएं। भाई लहणा जी ने बिना किसी संदेह के गर्म दूध लाया, लेकिन रास्ते में उनके हाथ जल गए। फिर भी, उन्होंने दूध नहीं गिराया। यह देखकर गुरु नानक देव जी ने उनकी भक्ति और धैर्य की सराहना की।
- सीख: सच्ची भक्ति में कष्ट सहने की ताकत होती है।
दूसरी परीक्षा: धैर्य की परीक्षा
एक बार गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को एक पेड़ के नीचे बैठकर प्रतीक्षा करने को कहा। दिन बीतते गए, लेकिन गुरु जी नहीं आए। फिर भी, भाई लहणा जी ने धैर्य नहीं खोया और निरंतर प्रतीक्षा करते रहे।
- सीख: गुरु के आदेश का पालन करने में धैर्य बनाए रखना चाहिए।
तीसरी परीक्षा: निस्वार्थ सेवा
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी से कहा कि वह एक बीमार व्यक्ति की सेवा करें। भाई लहणा जी ने न केवल उसकी सेवा की, बल्कि उसके घावों को भी धोया और उसकी देखभाल की। यह देखकर गुरु जी प्रसन्न हुए।
- सीख: निस्वार्थ सेवा ही सच्ची भक्ति है।
चौथी परीक्षा: विनम्रता की परीक्षा
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी से कहा कि वह गांव के लोगों के जूते साफ करें। भाई लहणा जी ने बिना किसी झिझक के यह कार्य किया। उनकी विनम्रता देखकर गुरु जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
- सीख: विनम्रता ही सच्चे गुरु का गुण है।
पांचवीं परीक्षा: त्याग की परीक्षा
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी से कहा कि वह अपना सारा धन दान कर दें। भाई लहणा जी ने बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसा ही किया। यह देखकर गुरु जी ने उन्हें धन्यवाद दिया।
- सीख: सच्चा शिष्य धन के मोह से मुक्त होता है।
छठी परीक्षा: साहस की परीक्षा
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को एक अंधेरी रात में जंगल में भेजा। भाई लहणा जी ने डर पर विजय पाई और गुरु के आदेश का पालन किया।
- सीख: गुरु के प्रति समर्पण में कोई डर नहीं होता।
सातवीं परीक्षा: अंतिम परीक्षा
गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को एक मृत शरीर को जलाने के लिए कहा। भाई लहणा जी ने बिना किसी प्रश्न के यह कार्य किया। गुरु जी ने देखा कि उनके हृदय में कोई भय नहीं है।
- सीख: सच्चा शिष्य मृत्यु के भय से भी मुक्त होता है।
गुरु अंगद देव जी का गुरु पद प्राप्त करना
इन सात परीक्षाओं को पूरा करने के बाद, गुरु नानक देव जी ने भाई लहणा जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और उन्हें गुरु अंगद देव जी का नाम दिया। उन्होंने गुरमुखी लिपि को सुधारा और लंगर प्रथा को मजबूत किया।
निष्कर्ष
गुरु अंगद देव जी की यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा गुरु बनने के लिए कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनकी भक्ति, समर्पण, धैर्य और निस्वार्थ सेवा हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज भी उनके उपदेश हमारे जीवन को प्रकाशित करते हैं।
- मुख्य सीख: गुरु की सेवा और आज्ञा का पालन ही सच्ची भक्ति है।
- संदेश: निस्वार्थ सेवा और विनम्रता ही मानवता का आधार है।
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