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Shiv-Parvati Reside Here as Pigeons यहां विराजते हैं शिव-पार्वती कबूतर के रूप में

जानिए शिव-पार्वती के कबूतर रूप में विराजने की अनोखी कथा। इस दिव्य प्रेरणादायक कहानी के रहस्य और महत्व को समझें। पढ़ें पूरी जानकारी हिंदी में।

Published July 2, 2026
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4 Min Read

यहां विराजते हैं शिव-पार्वती कबूतर के रूप में

भगवान शिव और माता पार्वती के अनेक रूपों और अवतारों की कथाएं हमारे धर्म ग्रंथों में भरी पड़ी हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ऐसा भी स्थान है जहां शिव-पार्वती ने कबूतर के रूप में अवतार लिया था? यह अद्भुत कथा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि प्रकृति और जीवों में दिव्यता के दर्शन भी कराती है। आइए जानते हैं इस पावन स्थान और उससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में।

Contents
यहां विराजते हैं शिव-पार्वती कबूतर के रूप मेंकहां स्थित है यह पावन स्थल?क्या है पौराणिक कथा?मंदिर की विशेषताएंक्यों महत्वपूर्ण है यह कथा?दर्शन के लिए विशेष समयकैसे पहुंचे?निष्कर्ष

कहां स्थित है यह पावन स्थल?

रामेश्वरम के पास स्थित कोट्टईयूर शिव मंदिर वह पवित्र स्थान है जहां भगवान शिव और माता पार्वती ने कबूतर का रूप धारण किया था। यह मंदिर तमिलनाडु के प्रसिद्ध शिवस्थलों में से एक है, जहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

  • स्थान: कोट्टईयूर गाँव, रामेश्वरम से 25 किमी दूर
  • विशेषता: मंदिर परिसर में कबूतरों का विशेष सम्मान
  • मान्यता: यहां आने वाले कबूतरों को शिव-पार्वती का रूप माना जाता है

क्या है पौराणिक कथा?

स्कंद पुराण में वर्णित इस कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती पृथ्वी भ्रमण के लिए निकले। वे मनुष्य रूप में न जाकर कबूतर के रूप में अवतरित हुए। कोट्टईयूर के इस स्थान पर आकर उन्होंने देखा कि यहां के ऋषि-मुनि गहन तपस्या में लीन हैं।

तभी अचानक एक शिकारी ने इन दोनों कबूतरों पर बाण चला दिया। घायल होने पर भी ये कबूतर वहीं रुके रहे और अपने दिव्य रूप में प्रकट होकर शिकारी को आशीर्वाद दिया। तभी से इस स्थान को “शिव-पार्वती का कबूतर अवतार स्थल” माना जाने लगा।

मंदिर की विशेषताएं

इस मंदिर की वास्तुकला और परंपराएं अद्वितीय हैं:

  • गर्भगृह: मुख्य मंदिर में शिवलिंग के साथ कबूतरों की मूर्तियां स्थापित हैं
  • विशेष पूजा: प्रतिदिन कबूतरों के लिए अन्न का भोग लगाया जाता है
  • मान्यता: यहां आकर कबूतरों को दाना चढ़ाने से शिव-पार्वती प्रसन्न होते हैं

क्यों महत्वपूर्ण है यह कथा?

इस दिव्य कथा के कई गहरे संदेश छिपे हैं:

  • सभी जीवों में दिव्यता: शिव-पार्वती का कबूतर रूप यह सिखाता है कि ईश्वर किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं
  • अहिंसा: शिकारी के प्रति क्षमा भाव जीव हिंसा न करने की प्रेरणा देता है
  • प्रकृति संरक्षण: पक्षियों के प्रति सम्मान का भाव पर्यावरण चेतना जगाता है

दर्शन के लिए विशेष समय

यदि आप इस पावन स्थल के दर्शन करना चाहते हैं तो इन समयों में जाना उत्तम रहता है:

  • मार्गशीर्ष मास: इस महीने में विशेष पूजा-अर्चना होती है
  • शिवरात्रि: यहां शिवरात्रि पर भव्य मेला लगता है
  • सुबह का समय: जब कबूतरों को भोग लगाया जाता है

कैसे पहुंचे?

कोट्टईयूर शिव मंदिर तक पहुंचने के लिए:

  • हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा मदुरै (150 किमी)
  • रेल मार्ग: रामेश्वरम रेलवे स्टेशन (25 किमी)
  • सड़क मार्ग: रामेश्वरम से बस या टैक्सी द्वारा

निष्कर्ष

कोट्टईयूर का यह अद्भुत शिव मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि हमें यह सीख भी देता है कि ईश्वर किसी भी रूप में हमारे बीच विद्यमान हो सकते हैं। कबूतर रूप में शिव-पार्वती की यह कथा हमें प्रकृति और जीवों के प्रति सम्मान का भाव विकसित करने की प्रेरणा देती है। यदि आप रामेश्वरम जाएं तो इस पावन स्थल के दर्शन अवश्य करें और शिव-पार्वती के इस अनोखे अवतार के दर्शन का पुण्य लाभ उठाएं।

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