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श्रीकृष्ण को क्यों जाना पड़ा द्वारका जानें इस मंदिर की खासियत

जानिए श्रीकृष्ण को द्वारका क्यों जाना पड़ा और इस पवित्र मंदिर की अनोखी खासियत। कृष्ण भक्तों के लिए जरूरी जानकारी और रोचक तथ्यों की खोज करें।

Published July 2, 2026
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4 Min Read

श्रीकृष्ण को क्यों जाना पड़ा द्वारका, जानें इस मंदिर की खासियत

भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से हर कोई परिचित है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्हें मथुरा छोड़कर द्वारका क्यों जाना पड़ा? यह प्रश्न हर भक्त के मन में उठता है। द्वारका न केवल भगवान कृष्ण की नगरी है, बल्कि यह चार धामों में से एक पवित्र तीर्थस्थल भी है। आइए, जानते हैं इस रहस्यमयी यात्रा और द्वारकाधीश मंदिर की विशेषताओं के बारे में…

Contents
श्रीकृष्ण को क्यों जाना पड़ा द्वारका, जानें इस मंदिर की खासियतमथुरा से द्वारका की यात्रा: क्या है पौराणिक कथा?द्वारकाधीश मंदिर: वास्तुशिल्प और आध्यात्मिक महत्वमंदिर का इतिहासवास्तुकला की विशेषताएंपूजा विधि और विशेष परंपराएंद्वारका से जुड़े रोचक तथ्यसमुद्र के गर्भ में खोई नगरीजगत मंदिर: एक अनोखी परंपराद्वारका यात्रा के लिए विशेष जानकारीनिष्कर्ष: द्वारका की आध्यात्मिक महिमा

मथुरा से द्वारका की यात्रा: क्या है पौराणिक कथा?

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, भगवान कृष्ण को मथुरा छोड़ने का निर्णय दो प्रमुख कारणों से लेना पड़ा:

  • कंस वध के बाद बढ़े शत्रुता: कंस के मरने के बाद उसके ससुर मगधराज जरासंध ने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया।
  • यदुवंशियों की सुरक्षा: जरासंध के आक्रमणों से यदुवंशियों को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने समुद्र के बीच नई नगरी बसाने का निश्चय किया।

एक रोचक तथ्य यह है कि द्वारका का निर्माण विश्वकर्मा जी ने केवल एक रात में किया था। इस नगरी को “कुशस्थली” भी कहा जाता था, जो आगे चलकर द्वारका के नाम से प्रसिद्ध हुई।

द्वारकाधीश मंदिर: वास्तुशिल्प और आध्यात्मिक महत्व

मंदिर का इतिहास

वर्तमान में स्थित द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ माना जाता है। यह मंदिर चार धामों (बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम और द्वारका) में से एक है। मंदिर के गर्भगृह में श्रीकृष्ण की चतुर्भुज मूर्ति विराजमान है, जो काले पत्थर से निर्मित है।

वास्तुकला की विशेषताएं

  • पांच मंजिला शिखर: मंदिर का मुख्य शिखर 78 मीटर ऊंचा है।
  • 72 स्तंभों वाला सभामंडप: ये स्तंभ पौराणिक कथाओं को दर्शाते हैं।
  • स्वर्ण कलश: शिखर पर स्थित कलश 52 किलो सोने से बना है।

पूजा विधि और विशेष परंपराएं

द्वारकाधीश मंदिर की पूजा पद्धति अद्वितीय है:

  • प्रतिदिन मंगला आरती से दिन की शुरुआत होती है।
  • भगवान को 7 बार वस्त्र परिवर्तन कराया जाता है।
  • श्रद्धालु “द्वारकाधीश महाराज की जय!” का जयघोष करते हैं।

द्वारका से जुड़े रोचक तथ्य

समुद्र के गर्भ में खोई नगरी

वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, प्राचीन द्वारका नगरी समुद्र में डूब चुकी है। समुद्र तल से मिले अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं। पुराणों में वर्णित है कि श्रीकृष्ण के देह त्यागने के बाद समुद्र ने पूरी नगरी को अपने आगोश में ले लिया था।

जगत मंदिर: एक अनोखी परंपरा

द्वारकाधीश मंदिर को “जगत मंदिर” भी कहा जाता है। यहां एक विशेष परंपरा है कि मंदिर के पट रात 8 बजे बंद हो जाते हैं और पुजारी मंदिर के बाहर “जागो मोहन प्यारे” का उद्घोष करते हैं, मानो भगवान को सुलाने जा रहे हों।

द्वारका यात्रा के लिए विशेष जानकारी

  • सर्वोत्तम समय: नवंबर से फरवरी (मौसम सुहावना रहता है)
  • प्रसिद्ध उत्सव: जन्माष्टमी, द्वारका पोडी (हर वर्ष कार्तिक माह में)
  • निकटवर्ती तीर्थ: बेट द्वारका, रुक्मिणी मंदिर, नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

निष्कर्ष: द्वारका की आध्यात्मिक महिमा

द्वारका न केवल एक ऐतिहासिक नगरी है, बल्कि यह भक्तों के लिए आस्था का प्रतीक भी है। श्रीकृष्ण की इस नगरी में आज भी उनकी दिव्य उपस्थिति का अनुभव किया जा सकता है। जैसा कि स्कंद पुराण में कहा गया है:

“द्वारावत्यां वसन् कृष्णः साक्षात् नारायणो हरिः।”
(द्वारका में निवास करने वाला कृष्ण स्वयं नारायण हैं।)

हर भक्त के जीवन में एक बार द्वारका धाम की यात्रा अवश्य करनी चाहिए, जहां भगवान कृष्ण की दिव्य लीला आज भी जीवंत है।

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