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Chaturmas 2025: देवशयनी एकादशी से शुरू महत्व और करें न करें

Chaturmas 2025 में आज से देवशयनी एकादशी के साथ शुरू हो रहा है। जानिए इस पावन अवधि का महत्व, व्रत नियम और क्या करें-क्या न करें। पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।

Published July 2, 2026
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4 Min Read

Chaturmas 2025: आज देवशयनी एकादशी के साथ शुरू होंगे चातुर्मास

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है, भगवान विष्णु के चार महीने के निद्राकाल की शुरुआत का प्रतीक है। यह पर्व चातुर्मास के आगमन की सूचना देता है, जो हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। 2025 में यह पर्व [तिथि] को मनाया जाएगा। इस अवधि में भक्तजन विशेष व्रत, पूजा और साधना करके अपने आध्यात्मिक जीवन को समृद्ध बनाते हैं।

Contents
Chaturmas 2025: आज देवशयनी एकादशी के साथ शुरू होंगे चातुर्मासचातुर्मास का महत्वपौराणिक आधारचातुर्मास के नियम: क्या करें और क्या न करेंक्या करें (आचरण)क्या न करें (परहेज)चातुर्मास के चार महीने और उनका विशेष महत्व1. आषाढ़ मास (देवशयनी एकादशी से)2. श्रावण मास3. भाद्रपद मास4. आश्विन मासविशेष साधना एवं व्रत विधिविशेष सावधानियांचातुर्मास का समापन: देवउठनी एकादशीनिष्कर्ष

चातुर्मास का महत्व

शास्त्रों में चातुर्मास को “व्रतों का राजा” कहा गया है। यह चार महीने (आषाढ़ से कार्तिक) भगवान विष्णु की योगनिद्रा के साथ-साथ प्रकृति के संरक्षण का भी समय होता है। इसकी महत्ता के पीछे कई आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण हैं:

  • आध्यात्मिक शुद्धि: इस अवधि में सत्कर्मों का विशेष फल मिलता है।
  • प्रकृति संरक्षण: वर्षाकाल में जीव-जंतुओं की रक्षा हेतु कुछ कार्य वर्जित होते हैं।
  • साधना का स्वर्णिम समय: ऋषि-मुनि एक स्थान पर रहकर तपस्या करते थे।

पौराणिक आधार

भविष्य पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं, तब देवी लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा करती हैं। इसीलिए इस अवधि में विष्णु भक्त विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। एक श्लोक में कहा गया है:

“आषाढ़स्य सिते पक्षे एकादश्यां समाहितः।
शयनं कुरुते विष्णुस्तस्माच्छयनिका स्मृता॥”

चातुर्मास के नियम: क्या करें और क्या न करें

क्या करें (आचरण)

  • दैनिक पूजा: विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा या भागवत पाठ का नियमित पाठ करें।
  • सात्विक आहार: दूध, फल, मेवा और साधारण भोजन ग्रहण करें।
  • दान-पुण्य: गरीबों को अन्न, वस्त्र या छत्र दान दें।
  • मौन व्रत: सप्ताह में एक दिन मौन रहकर आत्मचिंतन करें।

क्या न करें (परहेज)

  • मांसाहार व मदिरा: सभी प्रकार के तामसिक भोजन से दूर रहें।
  • विवाह संस्कार: इस अवधि में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।
  • वृक्ष छेदन: हरे पेड़ न काटें, प्रकृति का संरक्षण करें।
  • अनावश्यक यात्रा: जहां तक संभव हो, एक स्थान पर रहकर साधना करें।

चातुर्मास के चार महीने और उनका विशेष महत्व

1. आषाढ़ मास (देवशयनी एकादशी से)

इस माह में गुरु पूर्णिमा आती है। गुरुतत्व की आराधना और ज्ञान साधना के लिए यह उत्तम समय है।

2. श्रावण मास

भगवान शिव की विशेष पूजा का माह। सोमवार व्रत, कांवड़ यात्रा और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है।

3. भाद्रपद मास

कृष्ण जन्माष्टमी और हरतालिका तीज जैसे पर्व इसी माह में आते हैं। भगवान कृष्ण की भक्ति का समय।

4. आश्विन मास

इस माह में शारदीय नवरात्रि और देवउठनी एकादशी (चातुर्मास समापन) आती है। देवी दुर्गा और विष्णु की संयुक्त उपासना का समय।

विशेष साधना एवं व्रत विधि

चातुर्मास में पद्मपुराण के अनुसार निम्न साधनाएं फलदायी हैं:

  • एकादशी व्रत: प्रत्येक एकादशी को विष्णु पूजा व फलाहार करें।
  • दीपदान: शाम को मंदिर या तुलसी चौरा पर दीप जलाएं।
  • मंत्र जप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें।

विशेष सावधानियां

इस अवधि में क्रोध, झूठ और अहंकार से विशेष बचें। ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों को विशेष लाभ मिलता है।

चातुर्मास का समापन: देवउठनी एकादशी

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी के साथ चातुर्मास समाप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की जागृत अवस्था में पूजा की जाती है और विवाह आदि शुभ कार्य फिर से प्रारंभ होते हैं।

निष्कर्ष

चातुर्मास का पर्व हमें आत्मसंयम, सात्विकता और भक्ति का पाठ पढ़ाता है। यह समय अपने अंदर के अंधकार को दूर कर दिव्य प्रकाश की ओर बढ़ने का है। 2025 के इस पावन अवसर पर हम सभी प्रभु के चरणों में अपना समर्पण करें और इस काल को आध्यात्मिक उन्नति के लिए उपयोग करें।

श्री हरि की कृपा से आपका चातुर्मास मंगलमय हो!

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