षटतिला एकादशी 2025: पूजा विधि, महत्व और कथा
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने और पापों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। 2025 में, यह पावन तिथि 30 जनवरी, गुरुवार को मनाई जाएगी। आइए जानते हैं इस व्रत की पूजन विधि, महत्व और संबंधित कथा।
षटतिला एकादशी का महत्व
इस एकादशी को “षटतिला” नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इसमें छह प्रकार से तिल का उपयोग किया जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि यह व्रत:
- पापों का नाश करने वाला
- धन-धान्य देने वाला
- आरोग्य प्रदान करने वाला
- मोक्ष की प्राप्ति में सहायक
मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर तिल के छह उपयोग करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
षटतिला एकादशी पूजा विधि
इस व्रत को करने की विधि निम्नलिखित है:
व्रत की तैयारी
- दशमी की रात से ही ब्रह्मचर्य का पालन करें
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें
- साफ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु का स्मरण करें
पूजन प्रक्रिया
- पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें
- भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें
- तिल से बने छह प्रसाद अर्पित करें:
- तिल मिश्रित जल से अभिषेक
- तिल का उबटन
- तिल का हवन
- तिल का दान
- तिल से बना भोजन
- तिल मिश्रित जल से तर्पण
- निम्न मंत्र का जाप करें:“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
षटतिला एकादशी व्रत कथा
पुराणों में इस व्रत से जुड़ी एक रोचक कथा मिलती है। कहा जाता है कि एक बार एक ब्राह्मणी थी जो नियमित रूप से व्रत रखती थी लेकिन दान-पुण्य नहीं करती थी। मृत्यु के बाद वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर भगवान विष्णु के पास पहुंची।
भगवान ने उसे बताया कि केवल व्रत रखने से ही पुण्य प्राप्त नहीं होता। तब उसे षटतिला एकादशी का महत्व समझाया गया। इस व्रत को करने और तिल के छह प्रयोगों से उसे मुक्ति मिली। तभी से यह मान्यता है कि इस व्रत में तिल का विशेष महत्व है।
विशेष सुझाव और सावधानियां
- व्रत के दिन क्रोध, झूठ और चुगली से बचें
- तिल का दान जरूर करें – विशेषकर काले तिल
- रात्रि में भजन-कीर्तन करें
- अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद ही पारण करें
निष्कर्ष
षटतिला एकादशी का व्रत भक्ति और निष्ठा से करने पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। तिल के छह प्रयोगों से यह व्रत और भी फलदायी बन जाता है। 2025 में इस पावन अवसर पर सभी भक्तजन इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करें और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करें।
ध्यान दें: सभी मंत्रों और पूजन विधि का सही उच्चारण किसी विद्वान ब्राह्मण या गुरु के मार्गदर्शन में ही करें।
