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Dattatreya Jayanti 2025: दत्तात्रेय जयंती कब है? जन्म कथा

Published June 26, 2026
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4 Min Read

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Contents
Dattatreya Jayanti 2025: इस साल कब है दत्तात्रेय जयंती?दत्तात्रेय जयंती का महत्वभगवान दत्तात्रेय का जन्म कैसे हुआ?देवी अनुसूया की परीक्षादत्तात्रेय जयंती कैसे मनाएँ?पूजा विधिव्रत और दानभगवान दत्तात्रेय की शिक्षाएँदत्तात्रेय के प्रमुख मंदिरनिष्कर्ष

Dattatreya Jayanti 2025: इस साल कब है दत्तात्रेय जयंती?

हिंदू धर्म में भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेवों – ब्रह्मा, विष्णु और महेश का अवतार माना जाता है। दत्तात्रेय जयंती हर साल मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। 2025 में, यह पर्व 5 दिसंबर, शुक्रवार को पड़ रहा है। इस दिन भक्त उपवास रखकर, पूजा-अर्चना करके और दान-पुण्य करके भगवान दत्तात्रेय का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

दत्तात्रेय जयंती का महत्व

दत्तात्रेय जयंती का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह पर्व भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान, सद्बुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। भगवान दत्तात्रेय को गुरु का गुरु माना जाता है, इसलिए इस दिन गुरु-शिष्य परंपरा का भी सम्मान किया जाता है।

  • त्रिदेवों का समन्वित स्वरूप
  • आध्यात्मिक ज्ञान और तपस्या का प्रतीक
  • 24 गुरुओं से सीख की प्रेरणा
  • कर्मयोग और भक्ति का संदेश

भगवान दत्तात्रेय का जन्म कैसे हुआ?

पुराणों के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय के जन्म की कथा अद्भुत और रहस्यमयी है। उनका जन्म महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसूया के यहाँ हुआ था। अनुसूया अपने पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध थीं।

देवी अनुसूया की परीक्षा

एक बार ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अनुसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे तीनों ब्राह्मण के वेश में आए और अनुसूया से भिक्षा माँगी, लेकिन शर्त रखी कि वह उन्हें निर्वस्त्र होकर भिक्षा दे।

अनुसूया ने अपने पतिव्रत धर्म के बल पर तीनों देवताओं को शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया और उन्हें दूध पिलाया। देवताओं ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। इस प्रकार, त्रिदेवों के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

  • नाम का अर्थ: “दत्त” (विष्णु द्वारा दिया गया), “अत्रि” (अत्रि ऋषि के पुत्र)
  • प्रतीक: त्रिशूल (शिव), कमंडल (ब्रह्मा), चक्र (विष्णु)
  • साथी: चार कुत्ते (चार वेदों का प्रतीक)

दत्तात्रेय जयंती कैसे मनाएँ?

भक्त इस पावन दिन को विशेष रीति से मनाते हैं। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण विधियाँ बताई गई हैं:

पूजा विधि

  • प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  • घर के मंदिर में दत्तात्रेय की मूर्ति या चित्र स्थापित करें
  • लाल चंदन, फूल, धूप और दीप से पूजा करें
  • निम्न मंत्र का जाप करें: “ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः”
  • दत्तात्रेय चालीसा या भजन का पाठ करें

व्रत और दान

इस दिन उपवास रखने का विशेष महत्व है। भक्त फलाहार या एक समय का भोजन ग्रहण करते हैं। ब्राह्मणों को भोजन कराना, गरीबों को वस्त्र दान देना और गायों को चारा खिलाना पुण्यकारी माना जाता है।

भगवान दत्तात्रेय की शिक्षाएँ

दत्तात्रेय ने 24 गुरुओं से ज्ञान प्राप्त किया था, जिनमें पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, हिरण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, सर्प, बाण, मकड़ी और भृंगी शामिल हैं। इनसे उन्होंने ये महत्वपूर्ण सीख ली:

  • प्रकृति ही सर्वश्रेष्ठ गुरु है
  • विनम्रता से सीखने की प्रवृत्ति
  • आत्मनिर्भरता और आत्मज्ञान का महत्व
  • सभी प्राणियों में दिव्यता का दर्शन

दत्तात्रेय के प्रमुख मंदिर

भारत में भगवान दत्तात्रेय के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं जहाँ दत्तात्रेय जयंती पर विशेष उत्सव मनाया जाता है:

  • श्री दत्तात्रेय मंदिर, गिरनार (गुजरात)
  • श्रीपाद श्रीवल्लभ मंदिर (पीठापुरम, आंध्र प्रदेश)
  • दत्तादेव मंदिर (नारायणगाँव, महाराष्ट्र)
  • श्री गणपति सच्चिदानन्द मंदिर (मैसूर, कर्नाटक)

निष्कर्ष

दत्तात्रेय जयंती का पर्व हमें सिखाता है कि ज्ञान प्राप्ति के लिए हमें प्रकृति और सभी जीवों से सीखने को तैयार रहना चाहिए। भगवान दत्तात्रेय का जीवन संदेश देता है कि सच्चा ज्ञान विनम्रता, तपस्या और सर्वव्यापी दिव्यता के दर्शन में निहित है। 2025 में 5 दिसंबर को मनाए जाने वाले इस पावन पर्व पर हम सभी भगवान दत्तात्रेय के आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनके जीवन से प्रेरणा ले सकते हैं।

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