ईस्टर संडे का पावन पर्व
ईस्टर संडे, जिसे पुनरुत्थान रविवार भी कहा जाता है, ईसाई धर्म का सबसे पवित्र और आनंदमय पर्व है। यह दिन प्रभु यीशु मसीह के मृत्यु के तीसरे दिन पुनर्जीवित होने की घटना का स्मरण कराता है। 2025 में यह पर्व 20 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस लेख में हम जानेंगे कि ईस्टर का धार्मिक महत्व क्या है, इसे कैसे मनाया जाता है, और इससे जुड़ी प्रेरक परंपराएँ कौन-सी हैं।
ईस्टर संडे का धार्मिक महत्व
1. पुनरुत्थान की विजयगाथा
ईसाई मान्यताओं के अनुसार, गुड फ्राइडे के दिन प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाया गया था, लेकिन तीसरे दिन वे मृत्यु पर विजय पाकर जी उठे। यह घटना आशा, मुक्ति और नवजीवन का प्रतीक है। बाइबल में लिखा है:
“वह यीशु के पास आया और देखा कि वह मरा पड़ा है, परन्तु कफन में नहीं लिपटा।” (यूहन्ना 20:6-7)
2. पापों से मुक्ति का संदेश
ईस्टर का अर्थ है – “अंधकार पर प्रकाश की जीत”। यह पर्व सिखाता है कि ईश्वर की कृपा से हर पाप और निराशा का अंत हो सकता है।
ईस्टर कैसे मनाया जाता है?
1. विशेष प्रार्थना सेवाएँ
- ईस्टर विजिल: रात्रि में मोमबत्तियाँ जलाकर प्रभु के पुनरुत्थान की प्रतीक्षा की जाती है।
- सूर्योदय सेवा: भोर में खुले मैदानों में एकत्र होकर भजन गाए जाते हैं।
2. ईस्टर अंडे और खरगोश की परंपरा
अंडा नवजीवन और खरगोश उर्वरता का प्रतीक है। बच्चे रंग-बिरंगे अंडों से खेलते हैं और इन्हें उपहार में बाँटा जाता है।
3. पारंपरिक व्यंजन
- हॉट क्रॉस बन: क्रॉस के निशान वाली मीठी रोटियाँ।
- ईस्टर केक: फूलों और मोमबत्तियों से सजा विशेष केक।
भारत में ईस्टर उत्सव
गोवा, केरल और पूर्वोत्तर राज्यों में यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है। केरल के चर्चों में पुंजक्कुलंगारा नृत्य और गोवा में झांकी प्रदर्शन आकर्षण का केंद्र होते हैं।
ईस्टर से जुड़ी प्रेरक शिक्षाएँ
- क्षमा: यीशु ने सूली पर भी अपने अपमानकर्ताओं को क्षमा किया।
- साहस: मरियम मगदलीनी ने अंधकार में भी प्रभु की कब्र तक साहसपूर्वक यात्रा की।
निष्कर्ष: आत्मिक पुनर्जन्म का पर्व
ईस्टर संडे केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि हर मनुष्य के लिए आत्मिक पुनर्जन्म का अवसर है। चाहे आप ईसाई हों या नहीं, यह पर्व सभी को प्रेम, क्षमा और नई शुरुआत का संदेश देता है।
ईस्टर 2025 के इस पावन अवसर पर हम सभी के जीवन में आशा और आनंद की वर्षा हो, यही प्रभु यीशु से प्रार्थना है।

