भोलेनाथ का तीसरा नेत्र – एक रहस्यमयी शक्ति
भगवान शिव को त्रिनेत्रधारी कहा जाता है। उनके माथे पर विराजमान तीसरा नेत्र केवल एक आँख नहीं, बल्कि अनंत ज्ञान, तपस्या और विनाशक शक्ति का प्रतीक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिवजी को यह तीसरा नेत्र कैसे प्राप्त हुआ? इसके पीछे छुपी है एक पौराणिक कथा और गहन आध्यात्मिक सत्य।
कैसे खुला भगवान शिव का तीसरा नेत्र?
देवी पार्वती की चंचलता और शिव की तपस्या
पुराणों के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने भोलेनाथ के पीछे से आकर उनकी आँखें बंद कर दीं। शिवजी गहरी तपस्या में लीन थे, और अचानक अंधकार छा जाने से सम्पूर्ण ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया।
- शिव की आँखें बंद होते ही सृष्टि का संचालन रुक गया।
- सूर्य-चंद्रमा की रोशनी मंद पड़ने लगी।
- देवता घबरा गए कि अब प्रलय आ जाएगी।
तब भगवान शिव के माथे से एक तीव्र ज्योति प्रकट हुई – यही था उनका तीसरा नेत्र। इस नेत्र के खुलते ही अंधकार नष्ट हो गया और सृष्टि फिर से जीवित हो उठी।
तीसरा नेत्र – ज्ञान और विनाश का स्रोत
शिव का तीसरा नेत्र सिर्फ प्रकाश ही नहीं फैलाता, बल्कि यह अज्ञानता को जलाकर भस्म कर देता है। जब भी कोई अधर्म बढ़ता है, शिव इसी नेत्र से उसे नष्ट कर देते हैं।
संस्कृत श्लोक:
“ज्ञाननेत्रं महादेवं त्रिनेत्रं तपसां निधिम्।
यः पश्यति स पश्यति सत्यं ब्रह्म सनातनम्॥”
शिव के तीन नेत्रों का गहरा अर्थ
1. दायाँ नेत्र – सूर्य (प्रकाश और कर्म का प्रतीक)
- यह नेत्र सक्रिय ऊर्जा और कर्म का प्रतीक है।
- इसकी रोशनी में हम सही और गलत का भेद देख पाते हैं।
2. बायाँ नेत्र – चंद्रमा (मन और शांति का प्रतीक)
- यह नेत्र भावनाओं, शीतलता और आंतरिक शांति को दर्शाता है।
- जब यह नेत्र बंद होता है, तो मन अशांत हो जाता है।
3. तीसरा नेत्र – अग्नि (ज्ञान और विनाश का प्रतीक)
- यह आध्यात्मिक दृष्टि है, जो माया के पर्दे को हटा देती है।
- इस नेत्र की ज्वाला अहंकार, लालच और अज्ञान को जला देती है।
पौराणिक घटनाएँ जब खुला शिव का तीसरा नेत्र
1. कामदेव का भस्म होना
जब कामदेव ने शिव की तपस्या भंग करने की कोशिश की, तो भोलेनाथ ने तीसरे नेत्र से ही उसे भस्म कर दिया। इससे पता चलता है कि शिव की तपस्या को भंग करने वाला कोई नहीं बचता।
2. अंधकासुर का वध
राक्षस अंधकासुर ने ब्रह्मा जी से वरदान पाया था कि उसकी मृत्यु केवल एक “अंधे पुत्र” के हाथों होगी। शिवजी ने अपने तीसरे नेत्र से उसे जलाकर राख कर दिया, क्योंकि तीसरा नेत्र “अंधा” (सामान्य दृष्टि से रहित) था।
3. त्रिपुरासुर का संहार
त्रिपुरासुर ने तीनों लोकों को त्रस्त कर रखा था। तब शिव ने अपने तीसरे नेत्र से प्रकट की अग्नि, जिसने तीनों असुरों के नगरों को जलाकर राख कर दिया।
तीसरे नेत्र का आध्यात्मिक महत्व
1. आत्मज्ञान की प्राप्ति
शिव का तीसरा नेत्र हमें सिखाता है कि बाहरी दुनिया के बजाय आंतरिक ज्ञान पर ध्यान देना चाहिए। जब यह नेत्र खुलता है, तो साधक को परम सत्य का दर्शन होता है।
2. मोक्ष का द्वार
योगशास्त्र में तीसरा नेत्र आज्ञा चक्र से जुड़ा है। इसकी साधना से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
शिव पुराण का वचन:
“जो त्रिनेत्रधारी शंकर के इस नेत्र को समझ लेता है,
उसके लिए संसार के सभी रहस्य खुल जाते हैं।”
कैसे जागृत करें अपना तीसरा नेत्र?
हालाँकि शिव का तीसरा नेत्र दिव्य है, लेकिन हम भी अपनी आंतरिक दृष्टि को जगा सकते हैं:
- ध्यान और योग: नियमित रूप से आज्ञा चक्र पर ध्यान करें।
- सात्विक जीवन: झूठ, क्रोध और लालच से दूर रहें।
- मंत्र साधना: ॐ नमः शिवाय का जप करें।
तीसरा नेत्र – शिव की अनुपम देन
भगवान शिव का तीसरा नेत्र हमें सिखाता है कि सच्ची दृष्टि बाहर नहीं, अंदर होती है। यह हमारे अंदर छुपे अज्ञान को जलाकर हमें ज्ञान के प्रकाश से भर देता है। जय हो त्रिनेत्रधारी महादेव की!
अंतिम श्लोक:
“त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥”
(हम त्रिनेत्रधारी, सुगंधित, समृद्धिदायक भगवान की पूजा करते हैं, जो हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त कर अमरता प्रदान करें।)

