दशहरा और शस्त्र पूजा का महत्व
दशहरा, जिसे विजयदशमी भी कहते हैं, हिंदू धर्म में एक पावन पर्व है। यह दिन असत्य पर सत्य की विजय और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है। इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था और माँ दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था। शस्त्र पूजा का विधान इसी विजय के आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए है।
शस्त्र पूजा क्यों की जाती है?
शस्त्र पूजा का संबंध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति और साहस से भी है। पुराने समय में राजा-महाराजा युद्ध से पहले अपने शस्त्रों की पूजा करते थे। आज के समय में हम भी अपने जीवन के संघर्षों में विजय पाने के लिए इस परंपरा को निभाते हैं।
- आध्यात्मिक विजय: मन के विकारों पर जीत पाने के लिए।
- सुरक्षा: नकारात्मक शक्तियों से रक्षा हेतु।
- आत्मविश्वास: जीवन के युद्ध में साहस बढ़ाने के लिए।
शस्त्र पूजा की सही विधि
1. पूजा की तैयारी
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं।
- आवश्यक सामग्री: शस्त्र (तलवार, छुरी, या कोई भी औजार), फूल, अक्षत, कुमकुम, धूप, दीपक, नैवेद्य।
- मंत्र: “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” (माँ दुर्गा का मंत्र)
2. शस्त्र की पूजा विधि
- शस्त्र को लाल कपड़े पर स्थापित करें।
- उस पर फूल, अक्षत और कुमकुम चढ़ाएं।
- धूप-दीप दिखाकर नैवेद्य अर्पित करें।
- इस मंत्र का जाप करें: “ॐ नमो भगवते रुद्राय शस्त्राय नम:”
- अंत में आरती करें और प्रार्थना करें।
शस्त्र पूजा के लाभ
- शत्रु बाधा दूर होती है: नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा मिलती है।
- आत्मबल बढ़ता है: मन में साहस और धैर्य आता है।
- धार्मिक फल: देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
कुछ महत्वपूर्ण सावधानियाँ
- शस्त्र को कभी भी अपमानित न करें।
- पूजा के बाद उसे साफ कपड़े से पोंछकर सुरक्षित स्थान पर रखें।
- इस दिन क्रोध और ईर्ष्या से दूर रहें।
विजय का संकल्प
दशहरा का यह पावन अवसर हमें यह संदेश देता है कि अंधकार पर प्रकाश की जीत निश्चित है। शस्त्र पूजा करके हम न केवल बाहरी शत्रुओं पर, बल्कि अपने अंदर के डर, क्रोध और अहंकार पर भी विजय पा सकते हैं। इस विजयदशमी पर माँ दुर्गा और भगवान राम का आशीर्वाद सभी के जीवन में सुख, शांति और सफलता लेकर आए।
ॐ विजयी भवः

