मानस की ये चौपाईयां दूर कर देंगी तुलसीदास के नारी विरोधी होने का भ्रम
गोस्वामी तुलसीदास जी की अमर कृति रामचरितमानस भक्ति, नीति और समाज के उत्थान का अनुपम ग्रंथ है। किंतु कुछ लोग तुलसीदास जी को नारी विरोधी बताने की भूल कर बैठते हैं। यह भ्रम केवल उन पंक्तियों को अलग-अलग संदर्भ में देखने के कारण पैदा हुआ है। आइए, मानस की कुछ ऐसी चौपाइयों को समझें जो सिद्ध करती हैं कि तुलसीदास जी नारी जाति का अपमान नहीं, बल्कि सम्मान करते थे।
तुलसीदास जी का नारी दर्शन: संदर्भ और सार
मानस में नारी के प्रति कठोर शब्दों का प्रयोग केवल अधर्मी स्वभाव वाली स्त्रियों के लिए हुआ है, स्त्री जाति के लिए नहीं। तुलसीदास जी ने सीता मैया, अहिल्या, सबरी जैसी पवित्र नारियों का आदर्श रूप प्रस्तुत किया है।
- सीता मैया की महिमा: “बंदउँ जननी जगजननी। जासु पद सेवक स्वर्ग भवनि।” (बालकाण्ड)
- अहिल्या का उद्धार: “राम नाम बरुन बिषु ब्याली। हरइ अहिल्या जिमि पाप कलाली।” (बालकाण्ड)
- सबरी की भक्ति: “सबरी के बेर खाये रघुराई। भगत बिछोह जानहिं सब भाई।।” (अरण्यकाण्ड)
विवादित चौपाइयों का सही अर्थ
जिन पंक्तियों को नारी विरोधी माना जाता है, वे वास्तव में कामुकता और असंयम की निंदा करती हैं, न कि नारी जाति की।
1. “ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।”
संदर्भ: यह चौपाई अयोध्याकाण्ड में भरत जी के मुख से कहलवाई गई है, जब वे मंथरा के कुचक्र से कुपित हैं। यहाँ “नारी” शब्द विशेष रूप से दुष्ट स्वभाव वाली स्त्रियों के लिए प्रयुक्त हुआ है। तुलसीदास जी ने ही अन्यत्र लिखा:
“नारी तिलक सम अकलंक। करइ पावन जगत अभिरंक।।” (उत्तरकाण्ड)
2. “नारी अपवित्र, नरक की खान।”
सच्चाई: यह पंक्ति सुरपंखी (कीकसी) के चरित्र के संदर्भ में है, जो रावण की माता थी और उसने अपने पुत्र को अधर्म का मार्ग दिखाया। सामान्य नारी के लिए मानस में कहा गया:
“सकल प्रकृति नारी पुरुष माया। राम कृपा बिनु बूझ नहिं कोई।।” (अरण्यकाण्ड)
नारी का आदर्श रूप: मानस की प्रमुख चौपाइयां
- माता कौशल्या: “मातु पिता गुरु प्रभु पद नेहू। सकल प्रपंच यह सचित देहू।।” (अयोध्याकाण्ड)
- अनुसूइया का ज्ञान: “जेहि के जेहि पर सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू।।” (अरण्यकाण्ड)
- मंदोदरी की नीति: “भलहि भूप भरत बिधि जानी। नारि हित लागि बचन बखानी।।” (लंकाकाण्ड)
तुलसीदास जी की दृष्टि में नारी शक्ति
मानस के उत्तरकाण्ड में श्रीराम स्वयं कहते हैं:
“नारी नर की छबि होई। नर बिनु नारी अधूरी सोई।।”
इससे स्पष्ट है कि तुलसीदास जी नारी को पुरुष की पूरक शक्ति मानते थे, न कि नीची दृष्टि से देखते थे।
निष्कर्ष: भ्रम का निवारण
तुलसीदास जी ने मानस में चारित्रिक दोषों की निंदा की है, न कि नारी जाति की। जिस प्रकार कुकर्मी पुरुषों के लिए कठोर शब्द हैं, वैसे ही दुश्चरित्र स्त्रियों के लिए भी। समग्रता में पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि मानस नारी के पवित्र रूप को प्रतिष्ठित करता है।
आइए, हम मानस के संदर्भों को समझकर इस भ्रम को दूर करें और तुलसीदास जी के सच्चे संदेश को ग्रहण करें।
