पितृ पक्ष का समय हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर होता है। इस दौरान पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करके हम अपने पितरों को मोक्ष की प्राप्ति में सहायता करते हैं। वाल्मिकी रामायण में एक प्रसंग आता है जब माता सीता ने स्वयं महाराज दशरथ का पिंडदान किया था। यह घटना न केवल पितृ भक्ति का अनुपम उदाहरण है, बल्कि यह हमें पितृ ऋण से मुक्ति का महत्व भी सिखाती है।
पितृ पक्ष और इसका महत्व
क्या है पितृ पक्ष?
पितृ पक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए विभिन्न कर्मकांड करते हैं।
- तर्पण: जल, तिल और कुशा के माध्यम से पितरों को अर्पण।
- पिंडदान: चावल, दूध और घी से बने पिंड पितरों को समर्पित करना।
- ब्राह्मण भोज: पितरों की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराना।
पितृ पक्ष का आध्यात्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार, पितृ पक्ष में हमारे पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध कर्म से तृप्त होते हैं। यदि उन्हें यथोचित तर्पण नहीं मिलता, तो वे असंतुष्ट होकर कष्ट दे सकते हैं।
माता सीता द्वारा दशरथजी का पिंडदान: वाल्मिकी रामायण का प्रसंग
वनवास के दौरान की घटना
जब भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मणजी वनवास में थे, तब एक दिन महर्षि अत्रि के आश्रम में उन्हें पितृ पक्ष के बारे में ज्ञात हुआ। रामजी ने पिता दशरथ का श्राद्ध करने की इच्छा व्यक्त की, किंतु उनके पास पिंडदान के लिए आवश्यक सामग्री नहीं थी।
माता सीता की पितृ भक्ति
तब माता सीता ने फल्गु नदी (वर्तमान में फल्गू, गया) के तट पर बालू से ही पिंड बनाकर दशरथजी का पिंडदान किया। उन्होंने पूर्ण श्रद्धा से निम्न मंत्र का उच्चारण किया:
“ये समस्त पितरः सन्ति लोकेषु च ये गताः।
तेषां तृप्तिकरो भूयादेष मेऽस्तु पितृव्रतः॥”
दशरथजी की प्रसन्नता
माता सीता की पवित्र भक्ति से प्रसन्न होकर दशरथजी की आत्मा प्रकट हुई और उन्होंने आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा:
“हे पुत्रवधू! तुम्हारी पितृ भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मेरी आत्मा को तृप्ति मिली है और मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम सदैव पतिव्रता धर्म का पालन करोगी।”
माता सीता के पिंडदान से जुड़े महत्वपूर्ण सबक
1. पितृ ऋण का महत्व
हिंदू धर्म में पितृ ऋण को सबसे बड़ा ऋण माना गया है। माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता दिखाना हमारा धर्म है।
2. श्रद्धा ही सबसे बड़ी सामग्री
माता सीता ने बालू से ही पिंडदान किया, जो यह सिद्ध करता है कि श्रद्धा और भक्ति ही सबसे महत्वपूर्ण हैं। बाहरी सामग्री का अभाव भी पितरों को तृप्त करने में बाधक नहीं बनता।
3. स्त्री की पितृ भक्ति का सम्मान
इस प्रसंग से यह भी स्पष्ट होता है कि पितृ कर्म में स्त्रियों का अधिकार है और वे भी पूर्ण श्रद्धा से पितरों का तर्पण कर सकती हैं।
पितृ पक्ष 2025 में कैसे करें श्राद्ध कर्म?
मुहूर्त और तिथि
पितृ पक्ष 2025 में 18 सितंबर से 2 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। विशेष तिथियाँ:
- 18 सितंबर: पूर्णिमा श्राद्ध
- 25 सितंबर: अष्टमी श्राद्ध (महाभरणी)
- 2 अक्टूबर: सर्वपितृ अमावस्या
श्राद्ध कर्म की विधि
- स्नानादि: सुबह स्नान करके पवित्र वस्त्र धारण करें।
- तर्पण: काले तिल, जल और कुशा से पितरों का नाम लेकर तर्पण करें।
- पिंडदान: चावल, दूध और घी से पिंड बनाकर पितरों को अर्पित करें।
- ब्राह्मण भोज: श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराएँ।
माता सीता द्वारा दशरथजी का पिंडदान करना केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि पितृ भक्ति का अनुपम उदाहरण है। पितृ पक्ष में हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए। श्रद्धा और समर्पण ही वास्तविक पूजा है, यही इस प्रसंग से हमें सीख मिलती है।
“पितृदेवो भव, मातृदेवो भव।”
(ऋग्वेद)

