श्रावण की पावन बेला
श्रावण मास हिंदू धर्म में एक विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह वह समय है जब प्रकृति अपने पूरे श्रृंगार में होती है—हरियाली छाई होती है, बादल गरजते हैं, और धरती पर जीवन की नई लहर दौड़ पड़ती है। श्रावणी पर्व इसी जीवंतता का प्रतीक है, जिस दिन देवताओं और मनुष्यों के बीच का पवित्र संबंध और गहरा होता है।
श्रावणी पर्व का महत्व
धार्मिक दृष्टिकोण
श्रावणी पर्व, जिसे श्रावणी पूर्णिमा या रक्षा बंधन के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन का विशेष महत्व है:
- इस दिन वेद व्यास जयंती भी मनाई जाती है, जो महर्षि वेदव्यास के ज्ञान और योगदान को याद करने का अवसर देती है।
- इसी दिन यज्ञोपवीत संस्कार (जनेऊ धारण) का भी विधान है, जो ब्रह्मचर्य और ज्ञान की दीक्षा का प्रतीक है।
- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि दान में ली थी।
प्राकृतिक संदर्भ
श्रावण का महीना प्रकृति के नवजीवन का समय है। बारिश की बूंदें धरती को सींचकर उसमें नई ऊर्जा भर देती हैं। यह पर्व हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की प्रेरणा देता है।
श्रावणी पर्व की कथा एवं पौराणिक आधार
वेद व्यास और शिष्यों का ज्ञान यज्ञ
कहा जाता है कि इसी दिन महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्यों को चारों वेदों का ज्ञान दिया था। उन्होंने इस दिन को ज्ञान की दीक्षा के लिए शुभ माना और तभी से श्रावणी उपाकर्म की परंपरा शुरू हुई।
रक्षा बंधन की पौराणिक कथा
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब देवताओं और दानवों के बीच युद्ध छिड़ा, तो इंद्राणी (इंद्र की पत्नी) ने इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें विजयी बनाया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी रक्षा की कामना करती हैं।
श्रावणी पर्व कैसे मनाएं?
सुबह का शुभारंभ
- प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें।
- स्नान के बाद गायत्री मंत्र का जाप करें:
“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥”
यज्ञोपवीत धारण (जनेऊ संस्कार)
जो लोग इस दिन नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं, उन्हें गुरु या पुरोहित के सान्निध्य में संकल्प लेना चाहिए। इसके लिए निम्न मंत्र पढ़ा जाता है:
“यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥”
रक्षा सूत्र बांधने की विधि
- राखी के दिन बहनें भाई के माथे पर तिलक लगाकर उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं।
- इसके साथ यह मंत्र बोला जाता है:
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
श्रावणी पर्व का आध्यात्मिक संदेश
यह पर्व हमें तीन मूलभूत सीख देता है:
- संबंधों की मजबूती: रक्षा बंधन भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को दर्शाता है।
- ज्ञान की प्राप्ति: वेद व्यास जयंती हमें ज्ञानार्जन की प्रेरणा देती है।
- संस्कारों का पालन: यज्ञोपवीत संस्कार हमें अनुशासन और धार्मिक कर्तव्यों की याद दिलाता है।
निष्कर्ष: श्रावणी का पावन प्रेम
श्रावणी पर्व केवल एक रस्म या परंपरा नहीं, बल्कि जीवन के प्रति समर्पण और प्रेम का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति और प्रकृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इस श्रावण, आइए हम भी अपने जीवन में नई ऊर्जा, नए संकल्प और प्रेम भरे रिश्तों का स्वागत करें।
श्रावण की हर बूंद में छिपा है प्रभु का प्रेम,
राखी के धागे में बसी है भाई का सम्मान।
वेदों के ज्ञान से जगमगाए मन का आंगन,
यही है श्रावणी पर्व का अनमोल उपहार॥
इस पावन पर्व पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं!

