जीवन की चुनौतियाँ हर किसी के सामने आती हैं, लेकिन इनसे पार पाने का मार्ग श्रीमद्भगवद्गीता में छुपा है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए यह उपदेश न सिर्फ महाभारत के युद्धक्षेत्र में, बल्कि आज के समय में भी हर मनुष्य के लिए मार्गदर्शक हैं। आइए जानते हैं कि कैसे गीता का यह चमत्कारी महामंत्र आपके जीवन की हर समस्या का समाधान बन सकता है।
गीता क्या है और क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का वह अमूल्य अध्याय है जिसमें भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जीवन, धर्म, कर्म और मोक्ष के बारे में गहन ज्ञान दिया। यह 18 अध्यायों और 700 श्लोकों में विस्तृत है, जिनमें से हर एक श्लोक मनुष्य के लिए प्रकाशस्तंभ की तरह है।
गीता के प्रमुख उपदेश:
- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन – कर्म करो, फल की चिंता मत करो
- योगः कर्मसु कौशलम् – कुशलता पूर्वक कर्म करना ही योग है
- वासांसि जीर्णानि यथा विहाय – जिस तरह मनुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नया धारण करती है
कैसे करें गीता का पाठ और क्या हैं इसके लाभ?
गीता का नियमित पाठ करने से मन को शांति मिलती है और जीवन की समस्याओं का समाधान सहज ही प्राप्त हो जाता है। आइए जानते हैं गीता पाठ की सही विधि और इसके अद्भुत लाभों के बारे में।
गीता पाठ की विधि:
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हो जाएँ
- साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें
- भगवान कृष्ण की छवि या गीता पुस्तक के सामने दीप जलाएँ
- मन को शांत करके निम्न मंत्र का उच्चारण करें: “ॐ श्री परमात्मने नमः, श्रीमद्भगवद्गीतायै नमः”
- ध्यानपूर्वक गीता के श्लोकों का पाठ करें
गीता पाठ के लाभ:
- मानसिक शांति और आत्मबल की प्राप्ति
- निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि
- कर्म और धर्म का सही ज्ञान
- भय, चिंता और तनाव से मुक्ति
- जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण का विकास
गीता के ये 5 श्लोक बदल सकते हैं आपका जीवन
गीता में ऐसे अनेक श्लोक हैं जो सीधे हमारे हृदय को छूते हैं और जीवन को नई दिशा देते हैं। यहाँ हम आपके साथ 5 ऐसे ही शक्तिशाली श्लोक साझा कर रहे हैं:
1. श्लोक 2.47 – कर्म पर ध्यान दें, फल पर नहीं
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”
अर्थ: तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और न ही कर्म न करने में तेरी आसक्ति हो।
2. श्लोक 2.14 – सुख-दुःख को समान भाव से लें
“मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥”
अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाले इन्द्रियों और विषयों के संयोग तो उत्पन्न-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! तू उन्हें सहन कर।
3. श्लोक 6.5 – मन को ही बनाओ अपना मित्र
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥”
अर्थ: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आपको अपने द्वारा ही उठाए और अपने आपको न गिरने दे, क्योंकि आत्मा ही अपना मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु है।
4. श्लोक 18.66 – सर्वसमर्पण का मंत्र
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
अर्थ: सभी धर्मों को त्याग कर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।
5. श्लोक 2.20 – आत्मा का अमर स्वरूप
“न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥”
अर्थ: आत्मा न कभी जन्मता है, न मरता है, न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला है। यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
गीता ज्ञान को दैनिक जीवन में कैसे उतारें?
गीता का ज्ञान केवल पढ़ने या सुनने भर का नहीं, बल्कि जीने का विषय है। आइए जानते हैं कि कैसे हम रोजमर्रा की जिंदगी में गीता के उपदेशों को अपना सकते हैं:
- कर्मयोग: बिना फल की इच्छा के अपना कर्म करते रहें
- समत्व भाव: सफलता-विफलता, सुख-दुःख में समान भाव रखें
- आत्मविश्वास: “आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः” – स्वयं को ही अपना सच्चा मित्र मानें
- भगवद् आश्रय: हर परिस्थिति में भगवान के शरणागत हो जाएँ
- निष्काम सेवा: दूसरों की सेवा को ही परम धर्म समझें
गीता पाठ से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें
गीता के पाठ से पूर्व और पश्चात् कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- गीता की पुस्तक को कभी भी जमीन पर न रखें, हमेशा किसी स्वच्छ आसन या तख्त पर रखें
- गीता पाठ करते समय मन में किसी प्रकार का द्वेष या नकारात्मक भाव न लाएँ
- गीता का अध्ययन गुरु के मार्गदर्शन में करना सर्वोत्तम होता है
- गीता पाठ के बाद थोड़ी देर मौन रहकर उसके अर्थ पर चिंतन करें
- गीता के ज्ञान को दूसरों तक पहुँचाने का प्रयास करें
श्रीमद्भगवद्गीता न सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला एक संपूर्ण जीवन दर्शन है। इसके नियमित पाठ और चिंतन से मनुष्य जीवन के हर संकट से पार पा सकता है। भगवान कृष्ण द्वारा दिया गया यह चमत्कारी महामंत्र हर उस व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक है जो सच्चे अर्थों में जीवन जीना चाहता है।
आइए, हम सभी प्रण करें कि गीता के ज्ञान को अपने दैनिक जीवन में उतारेंगे और इस पवित्र ग्रंथ के संदेश को औरों तक पहुँचाएँगे। “यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिः ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥”

