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पत्नी को पति के बायीं ओर कब और क्यों होना चाहिए | When and Why Wife Should Be on Husband’s Left Side

पत्नी को पति के बायीं ओर क्यों बैठना चाहिए? जानिए वैज्ञानिक, धार्मिक और सामाजिक कारणों से इस परंपरा का महत्व और फायदे।

Published July 2, 2026
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3 Min Read

पत्नी को कब और क्यों पति के बायीं ओर होना चाहिए

हिंदू धर्म में विवाहित जीवन के लिए कई संस्कार और नियम बताए गए हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण प्रथा है पत्नी का पति के बायीं ओर बैठना या खड़ा होना। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक कारणों से जुड़ी हुई मान्यता है। आइए, इसके पीछे के रहस्य को समझते हैं।

Contents
पत्नी को कब और क्यों पति के बायीं ओर होना चाहिएधार्मिक और आध्यात्मिक महत्ववैज्ञानिक दृष्टिकोणविशेष अवसरों पर इस नियम का पालनपौराणिक उदाहरणसमकालीन संदर्भ में प्रासंगिकतानिष्कर्ष

धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

शास्त्रों के अनुसार, पति-पत्नी का संबंध केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक एकता का प्रतीक है। बायां भाग हृदय की ओर संकेत करता है, जहां प्रेम और भावनाएं निवास करती हैं।

  • वैदिक मंत्रों का महत्व: विवाह के समय पत्नी को पति के बायीं ओर बैठाया जाता है, क्योंकि यज्ञोपवीत संस्कार में पुरुष का दायां हाथ पवित्र माना जाता है।
  • ऊर्जा का संतुलन: बायां भाग चंद्र नाड़ी (इडा) से जुड़ा है, जो शांति और स्त्री ऊर्जा का प्रतीक है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आधुनिक विज्ञान भी इस परंपरा के पीछे के तर्क को स्वीकार करता है:

  • हृदय की सुरक्षा: पुरुष के बायीं ओर पत्नी के होने से उसका दायां हाथ (जो अधिक सक्रिय होता है) सुरक्षात्मक भूमिका निभा सकता है।
  • मनोवैज्ञानिक सुकून: शोध बताते हैं कि बायीं ओर प्रियजन का होना मस्तिष्क में सकारात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।

विशेष अवसरों पर इस नियम का पालन

कुछ विशेष परिस्थितियों में यह परंपरा अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है:

  • विवाह संस्कार: सप्तपदी के दौरान पत्नी को पति के बायीं ओर ही रहना चाहिए।
  • धार्मिक अनुष्ठान: हवन या पूजा के समय यह स्थिति ऊर्जा प्रवाह को संतुलित करती है।
  • सामाजिक समारोह: मांगलिक कार्यक्रमों में इस नियम का पालन शुभ माना जाता है।

पौराणिक उदाहरण

हमारे ग्रंथों में अनेक उदाहरण इस परंपरा की पुष्टि करते हैं:

  • शिव-पार्वती: समस्त चित्रों में माता पार्वती भगवान शिव के बायीं ओर विराजमान दिखाई देती हैं।
  • राम-सीता: वनवास के समय सीता माता हमेशा श्रीराम के बाएं ही चलती थीं।

समकालीन संदर्भ में प्रासंगिकता

आज के युग में जहां समानता पर बल दिया जाता है, वहीं इस परंपरा को सम्मान का प्रतीक माना जाना चाहिए, न कि अधीनता का। यह दाम्पत्य जीवन में सामंजस्य बनाए रखने का एक सुंदर तरीका है।

निष्कर्ष

पति के बायीं ओर पत्नी का स्थान लेने की यह प्रथा केवल एक रीति-रिवाज नहीं, बल्कि हमारे ऋषियों द्वारा प्रदत्त जीवन जीने की कला है। यह दाम्पत्य जीवन में प्रेम, सुरक्षा और आध्यात्मिक एकता को बढ़ावा देती है। आधुनिक युग में भी हमें इन परंपराओं के वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व को समझना चाहिए।

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