अनुष्ठान में पति के बाईं ओर क्यों बैठती है पत्नी? शास्त्रों में छिपा है रहस्य
हिंदू संस्कृति में हर रीति-रिवाज और परंपरा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक, आध्यात्मिक या शास्त्रीय कारण छिपा होता है। ऐसी ही एक परंपरा है विवाहित स्त्री का पति के बाईं ओर बैठना। चाहे यज्ञ हो, हवन हो या कोई भी धार्मिक अनुष्ठान, पत्नी हमेशा पति के बाएं तरफ ही आसन ग्रहण करती है। आइए जानते हैं कि शास्त्रों और वैदिक परंपराओं में इसका क्या महत्व बताया गया है।
वैदिक परंपरा में वामांगी का महत्व
शास्त्रों में पत्नी को “वामांगी” कहा गया है, जिसका अर्थ है “बाईं ओर वाली”। यह स्थान केवल एक रस्म नहीं, बल्कि दांपत्य जीवन के गहरे सूत्रों को दर्शाता है:
- ऊर्जा का संतुलन: वैदिक मान्यता के अनुसार पुरुष का दायां भाग सूर्य नाड़ी (पिंगला) और स्त्री का बायां भाग चंद्र नाड़ी (इडा) का प्रतीक है।
- पूर्णता का प्रतीक: पति-पत्नी के इस मिलन से अर्धनारीश्वर की अवधारणा पूर्ण होती है।
- मंत्रों का प्रभाव: यज्ञ में दक्षिण हस्त से आहुति देते समय पत्नी का बायां हिस्सा ऊर्जा को संयमित करता है।
शास्त्रों में वर्णित कारण
मनुस्मृति और गृह्यसूत्रों में इस प्रथा के पीछे तीन मुख्य तर्क दिए गए हैं:
- हृदय की निकटता: मानव शरीर में हृदय बाईं ओर स्थित होता है। पत्नी का वहां बैठना प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक है।
- सृजन और पालन का सिद्धांत: बायां भाग सृजनात्मक शक्ति (प्रकृति) और दायां भाग पालनकर्ता (पुरुष) का प्रतिनिधित्व करता है।
- नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा: मान्यता है कि पति का दायां हाथ सुरक्षा कवच बनाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक विज्ञान भी इस परंपरा को मान्यता देता है:
- मस्तिष्क का विभाजन: बायां मस्तिष्क (जो दाईं ओर नियंत्रित करता है) तार्किकता और दायां मस्तिष्क (बाईं ओर नियंत्रित) भावनाओं का केंद्र है।
- हृदय गति पर प्रभाव: शोध बताते हैं कि प्रियजन के बाएं ओर बैठने से हृदय गति सामंजस्य बैठाती है।
पौराणिक उदाहरण
शास्त्रों में अनेक प्रसंग इस परंपरा को दृढ़ करते हैं:
- देवी पार्वती हमेशा शिवजी के वामांग में विराजमान हैं।
- रामायण में सीताजी ने अयोध्या आगमन पर रामचंद्रजी के बाएं ओर आसन ग्रहण किया था।
- शुक्राचार्य ने दैत्यों को सलाह दी थी कि यज्ञ में स्त्रियों को पुरुषों के वाम भाग में बैठाएं।
आधुनिक समय में प्रासंगिकता
यह परंपरा आज भी इन कारणों से महत्वपूर्ण है:
- समानता का प्रतीक: बाएं-दाएं का भेद समर्पण नहीं, बल्कि पूरकता दर्शाता है।
- पारिवारिक सामंजस्य: इस स्थिति में बैठने से संवाद और सहयोग बढ़ता है।
- सांस्कृतिक धरोहर: पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा हमारी पहचान है।
निष्कर्ष
हिंदू विवाह के समय “सव्यानि दक्षिणेन पाणिना” (शुक्ल यजुर्वेद 8.22) मंत्र के साथ वर वधू का दाहिना हाथ पकड़ता है, जबकि वधू उसके बाएं ओर स्थान ग्रहण करती है। यह कोरी रूढ़ि नहीं, बल्कि दिव्य सामंजस्य का प्रतीक है। जहां पति जीवन रूपी रथ का सारथी बनता है, वहीं पत्नी उसकी वामांगिनी बन मार्गदर्शन करती है। शास्त्रों की यह गहन शिक्षा हमें बताती है कि प्रेम और समर्पण में बाएं-दाएं का भेद नहीं, बल्कि पूर्णता का भाव निहित होता है।
