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नवरात्र चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा का महत्व

Published June 26, 2026
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4 Min Read

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Contents
नवरात्र के चौथे दिन क्यों होती है मां कूष्मांडा की पूजा?मां कूष्मांडा का स्वरूप और महत्वचौथे दिन पूजा का कारणमां कूष्मांडा की पूजा विधिमंत्र और आरतीमां कूष्मांडा की कथाभक्तों के लिए संदेशनिष्कर्ष

नवरात्र के चौथे दिन क्यों होती है मां कूष्मांडा की पूजा?

नवरात्रि का चौथा दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा के लिए समर्पित है। यह दिन भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि मां कूष्मांडा समस्त ब्रह्मांड की सृजनकर्ता मानी जाती हैं। आइए जानते हैं कि नवरात्र के चौथे दिन इनकी पूजा क्यों की जाती है और इसके पीछे क्या रहस्य छिपा है।

मां कूष्मांडा का स्वरूप और महत्व

मां कूष्मांडा का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है – “कूष्म” (अर्थात ब्रह्मांड) और “अंडा” (अर्थात अंडे के आकार का)। इन्हें ब्रह्मांड की उत्पत्ति का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी।

  • स्वरूप: मां कूष्मांडा आठ भुजाओं वाली हैं और इनके हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा तथा जपमाला विद्यमान हैं।
  • वाहन: इनका वाहन सिंह है, जो शक्ति और निर्भयता का प्रतीक है।
  • प्रिय भोग: मां को मालपुए का भोग अत्यंत प्रिय है।

चौथे दिन पूजा का कारण

नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा का विशेष महत्व है, क्योंकि:

  • सृजन का प्रतीक: यह दिन सृष्टि के निर्माण और ऊर्जा के प्रवाह को दर्शाता है।
  • सूर्य नाड़ी का संबंध: मान्यता है कि मां कूष्मांडा सूर्यलोक में निवास करती हैं और उनकी कृपा से भक्तों का मन प्रकाशित होता है।
  • रोगों का नाश: इनकी पूजा से शारीरिक और मानसिक रोग दूर होते हैं तथा आयु और तेज में वृद्धि होती है।

मां कूष्मांडा की पूजा विधि

चौथे दिन की पूजा विधि में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • लाल रंग के फूल और कपड़े का प्रयोग करें, क्योंकि यह मां को प्रिय है।
  • पूजा स्थल पर मां कूष्मांडा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  • मालपुए का भोग लगाएं और दीपक जलाएं।

मंत्र और आरती

मां कूष्मांडा की पूजा में निम्न मंत्रों का जाप करना चाहिए:

मंत्र:
“ॐ देवी कूष्मांडायै नमः॥”
या
“सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥”

आरती:
“जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी…
तुमको निशिदिन ध्यावत, तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवरी॥”

मां कूष्मांडा की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां कूष्मांडा ने ही सर्वप्रथम ब्रह्मांड को अपनी दिव्य मुस्कान से उत्पन्न किया था। जब संपूर्ण विश्व अंधकारमय था, तब इन्होंने अपने तेज से प्रकाश फैलाया और सृष्टि की रचना की। इसीलिए इन्हें आदिशक्ति का स्वरूप माना जाता है।

भक्तों के लिए संदेश

मां कूष्मांडा की पूजा करने वाले भक्तों को जीवन में निम्नलिखित शिक्षा मिलती है:

  • सृजनात्मकता: जिस प्रकार मां ने ब्रह्मांड की रचना की, उसी प्रकार हमें अपने जीवन को सकारात्मकता से सजाना चाहिए।
  • आंतरिक प्रकाश: मां का आशीर्वाद हमारे अंदर के अंधकार को दूर करता है।
  • स्वास्थ्य और ऊर्जा: इनकी कृपा से शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।

निष्कर्ष

नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा करने से भक्तों को जीवन में अनंत ऊर्जा और सकारात्मकता प्राप्त होती है। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि मां दुर्गा का यह स्वरूप हमें सृजन, प्रकाश और स्वास्थ्य का आशीर्वाद देता है। आइए, हम सभी मां कूष्मांडा की कृपा पाने के लिए पूरे मन से उनकी आराधना करें।

मां कूष्मांडा की जय! जय माता दी!

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