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इच्छा पूर्ति पर भूल जाते हैं ईश्वर का प्रेम We Forget God’s Love After Fulfillment

इच्छा पूरी होते ही हम ईश्वर को भूल जाते हैं, जानिए क्यों और कैसे बनाएं सच्चा spiritual connection। पढ़ें इस गहन विश्लेषण को और पाएं आंतरिक शांति।

Published July 2, 2026
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4 Min Read

इच्छा की पूर्ति होते ही हम ईश्वर को प्रेम करना छोड़ देते हैं

हम सभी के जीवन में ऐसे पल आते हैं जब हम ईश्वर से कुछ माँगते हैं – स्वास्थ्य, धन, सफलता, या संतान। पर क्या हमने कभी सोचा है कि जब हमारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं, तो हम भगवान को भूलने लगते हैं? यह एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है, जिस पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।

Contents
इच्छा की पूर्ति होते ही हम ईश्वर को प्रेम करना छोड़ देते हैंमनुष्य और ईश्वर का संबंध: एक अधूरा प्रेमक्यों भूल जाते हैं हम ईश्वर को?सच्ची भक्ति का मार्गधर्मग्रंथों से शिक्षाव्यावहारिक सुझावनिष्कर्ष

मनुष्य और ईश्वर का संबंध: एक अधूरा प्रेम

भक्ति और प्रार्थना का सच्चा स्वरूप तब सामने आता है जब हम बिना किसी स्वार्थ के ईश्वर से जुड़ते हैं। पर अक्सर:

  • संकट के समय – हम मंदिरों की ओर भागते हैं
  • इच्छा पूर्ति के बाद – हमारी भक्ति ठंडी पड़ जाती है
  • सुख के दिनों में – हम अपने आराध्य को याद तक नहीं करते

श्रीमद्भागवत गीता (7.16) में भगवान कृष्ण कहते हैं: “चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥” – चार प्रकार के लोग मेरी भक्ति करते हैं: दुखी, जिज्ञासु, धन की इच्छा रखने वाले और ज्ञानी।

क्यों भूल जाते हैं हम ईश्वर को?

इस मनोवैज्ञानिक घटना के पीछे कई कारण छिपे हैं:

  • स्वार्थपरता – हमारी भक्ति अक्सर ‘लेन-देन’ के समान होती है
  • अहंकार – सफलता मिलते ही हम स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने लगते हैं
  • भौतिकवाद – सांसारिक सुखों में डूबकर हम आध्यात्मिकता भूल जाते हैं

सच्ची भक्ति का मार्ग

प्रेम और समर्पण का वह स्वरूप जो इच्छाओं से परे है:

  • निष्काम भाव – फल की इच्छा रखे बिना सेवा करना
  • नित्य स्मरण – सुख-दुःख हर अवस्था में ईश्वर को याद रखना
  • कृतज्ञता – प्राप्त वरदानों के लिए सदैव आभार व्यक्त करना

धर्मग्रंथों से शिक्षा

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं: “बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं भाई। सब विधि सकल सुभ गति सुखदाई॥” – भगवान की कृपा के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता।

इसी प्रकार शिव पुराण में कहा गया है: “यः प्रार्थयति स तु मूढः, यो न प्रार्थयति स एव मूढः।” – जो केवल माँगता रहता है वह मूर्ख है, और जो कभी माँगता ही नहीं वह भी मूर्ख है।

व्यावहारिक सुझाव

इस स्थिति से बचने के लिए अपनाएँ ये उपाय:

  • नियमित साधना – रोज थोड़ा समय ईश्वर को दें
  • सेवा भाव – दूसरों की मदद करके परमात्मा की सेवा करें
  • संत संगति – अच्छे साधकों के साथ समय बिताएँ

निष्कर्ष

ईश्वर से प्रेम करने का सही तरीका यही है कि हम उन्हें सिर्फ माँगने के लिए न याद करें, बल्कि उनके प्रति शुद्ध प्रेम और समर्पण भाव रखें। जैसे एक माँ अपने बच्चे से बिना शर्त प्यार करती है, वैसे ही हमें भी परमात्मा से प्रेम करना चाहिए – बिना किसी शर्त के, बिना किसी अपेक्षा के।

आइए, हम संकल्प लें कि चाहे सुख हो या दुःख, हम ईश्वर को अपने हृदय से कभी विस्मृत नहीं करेंगे। यही सच्ची भक्ति का मार्ग है।

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