व्रत का महत्व और आध्यात्मिक आधार
हिंदू धर्म में व्रत-उपवास का विशेष स्थान है। यह न केवल शारीरिक शुद्धि का माध्यम है, बल्कि मन और आत्मा को भी पवित्र करता है। चार दिन के इस व्रत का संबंध देवी-देवताओं की कृपा पाने और पारिवारिक सुख-समृद्धि के लिए है। आइए, जानते हैं कि यह व्रत क्यों आवश्यक माना जाता है और इसके पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्य क्या हैं।
इन चार दिनों का व्रत किसलिए?
1. देवी की कृपा प्राप्त करने हेतु
- इन चार दिनों में माँ लक्ष्मी, सरस्वती या पार्वती की विशेष पूजा की जाती है।
- व्रत रखने से देवी प्रसन्न होती हैं और आशीर्वाद देती हैं।
2. पति की लंबी आयु और स्वास्थ्य के लिए
- कई परंपराओं में यह व्रत सुहागिन स्त्रियों द्वारा पति की दीर्घायु के लिए रखा जाता है।
- इसका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है।
3. संतान की सुख-समृद्धि हेतु
- माताएँ अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए इस व्रत को करती हैं।
व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा
सती अनुसूया की कहानी
प्राचीन काल में, अनुसूया नामक एक पतिव्रता स्त्री ने इस व्रत को कठोरता से पालन किया था। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें वरदान दिया कि “जो भी स्त्री इस विधि से व्रत करेगी, उसके परिवार पर सदैव मेरी कृपा बनी रहेगी।”
व्रत की विधि: सही तरीका और मंत्र
दिन 1: संकल्प और पूजा
- सुबह स्नान करके लाल या पीले वस्त्र धारण करें।
- कलश स्थापना करते हुए इस मंत्र का उच्चारण करें:
“ॐ देव्यै नमः, व्रतमहं करिष्ये, सफलं कुरु मे प्रभो।”
दिन 2-4: नियम और आहार
- फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करें।
- प्रतिदिन दीपक जलाएँ और आरती करें।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: स्वास्थ्य लाभ
- पाचन तंत्र को आराम मिलता है।
- मन की एकाग्रता बढ़ती है।
- शरीर से विषैले तत्व बाहर निकलते हैं।
आस्था और विज्ञान का मेल
यह व्रत केवल एक रीति नहीं, बल्कि श्रद्धा, स्वास्थ्य और समर्पण का संगम है। जो महिलाएँ इसे पूरी निष्ठा से करती हैं, उनके जीवन में देवी की कृपा स्पष्ट देखी जा सकती है।
“व्रतेन द्वारं प्राप्यते, तपसा स्वर्गमृच्छति।”
(व्रत से दिव्य द्वार खुलते हैं, तप से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।)
अगर आपने यह व्रत किया है, तो अपने अनुभव कमेंट में साझा करें! 🙏

