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शक्तिपीठ जहां गिरा था देवी सती का स्तन Vishnu’s Chakra Se

जानें शक्तिपीठ के बारे में जहां विष्णु के चक्र से कटकर देवी सती का स्तन गिरा था। इस पावन स्थान का इतिहास, महत्व और आध्यात्मिक रहस्य जानने के लिए पढ़ें।

Published July 2, 2026
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4 Min Read

शक्तिपीठ जहाँ गिरा था विष्णु के चक्र से कटकर देवी सती का स्तन

हिंदू धर्म में शक्तिपीठ का विशेष महत्व है। ये वो पावन स्थल हैं जहाँ देवी सती के अंग या आभूषण गिरे थे। इनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण शक्तिपीठ वह है जहाँ माता सती का स्तन गिरा था। यह घटना भगवान विष्णु के चक्र से जुड़ी हुई है और इसका वर्णन पुराणों में मिलता है। आइए, इस पावन स्थान की कथा, महत्व और मान्यताओं को विस्तार से जानते हैं।

Contents
शक्तिपीठ जहाँ गिरा था विष्णु के चक्र से कटकर देवी सती का स्तनदेवी सती की कथा और शक्तिपीठों का निर्माणशक्तिपीठ का स्थान और मान्यताएँपौराणिक महत्व और व्रत-पूजामंत्र और आराधनानिष्कर्ष

देवी सती की कथा और शक्तिपीठों का निर्माण

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन नहीं किया और योगाग्नि द्वारा अपने प्राण त्याग दिए। भगवान शिव इस घटना से क्रोधित हो गए और सती के शव को लेकर तांडव करने लगे। संसार को इस विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शव के टुकड़े कर दिए। जहाँ-जहाँ ये अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हो गए।

  • देवी सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है स्तन शक्तिपीठ।
  • इस स्थान पर माता का स्तन गिरा था, जिससे यहाँ की शक्ति को स्तन देवी या जयन्ती देवी कहा जाता है।
  • पुराणों में इस स्थान को जयंतीपीठ या कामाख्या पीठ से जोड़कर देखा जाता है।

शक्तिपीठ का स्थान और मान्यताएँ

इस शक्तिपीठ का सटीक स्थान विद्वानों में विवाद का विषय रहा है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, यह पीठ असम के कामाख्या मंदिर में स्थित है, जबकि अन्य मतों में इसे बांग्लादेश के जयंती गाँव में स्थित बताया गया है। दोनों ही स्थानों पर देवी के स्तन के गिरने की मान्यता प्रचलित है।

  • कामाख्या मंदिर: यहाँ देवी की योनि गिरी थी, लेकिन कुछ परंपराओं में स्तन के भाग का भी उल्लेख है।
  • जयंतीपीठ (बांग्लादेश): यहाँ देवी का स्तन गिरा माना जाता है और देवी को जयन्ती या स्तन देवी के रूप में पूजा जाता है।

पौराणिक महत्व और व्रत-पूजा

इस शक्तिपीठ की पूजा विशेष रूप से नवरात्रि और शारदीय पूर्णिमा के अवसर पर की जाती है। यहाँ देवी की पूजा करने से स्त्री जाति को संतान सुख और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।

  • यहाँ स्तोत्र पाठ और दुर्गा सप्तशती का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
  • देवी को लाल वस्त्र, चुनरी और मिष्ठान्न का भोग लगाया जाता है।
  • मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से माँगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है।

मंत्र और आराधना

इस शक्तिपीठ पर देवी की आराधना के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण किया जाता है:

“ॐ जयन्त्यै नमः”

या

“ॐ ह्रीं क्लीं जयन्ती देव्यै नमः”

इसके अलावा, दुर्गा चालीसा और देवी महात्म्य का पाठ भी यहाँ किया जाता है।

निष्कर्ष

देवी सती के स्तन से जुड़ा यह शक्तिपीठ भक्तों के लिए अत्यंत पावन स्थान है। यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा और दिव्य शक्ति भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करती है। चाहे वह कामाख्या हो या जयंतीपीठ, दोनों ही स्थान देवी के अंग के पतन से जुड़े होने के कारण अत्यंत पूजनीय हैं। माँ के भक्तों को एक बार अवश्य ही इस पवित्र स्थान के दर्शन करने चाहिए।

जय माता दी!

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