भक्ति का सच्चा स्वरूप
हम अक्सर मंदिरों में जाते हैं, भगवान को फल-फूल चढ़ाते हैं, धूप-दीप जलाते हैं। लेकिन क्या वाकई में भगवान हमारे इन भौतिक चढ़ावों के भूखे हैं? शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है – “पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥” (भगवद्गीता 9.26)। यानी, पत्ता, फूल, फल या जल – भगवान को सिर्फ भाव चाहिए। वे भक्त के हृदय की शुद्ध भक्ति को ही स्वीकार करते हैं।
भगवान क्यों नहीं चाहते फल-फूल?
1. वे तो पूर्ण हैं, उन्हें किसी चीज की आवश्यकता नहीं
- भगवान विष्णु, शिव या देवी – सभी स्वयंपूर्ण हैं। वे हमारे द्वारा चढ़ाए गए फल-फूलों पर निर्भर नहीं।
- श्रीमद्भागवतम् (3.9.4) कहता है – “न तस्य कार्यं किंचित्” (उन्हें किसी चीज की आवश्यकता नहीं)।
2. भाव ही असली भेंट है
- एक गरीब भक्त के टूटे फूल को भगवान नहीं, बल्कि उसका समर्पण स्वीकार करते हैं।
- मीराबाई ने गाया – “मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोय…” – यही सच्ची भावना है।
भक्ति के तीन स्तर: कर्म, भाव और प्रेम
1. कर्म स्तर: बाह्य चढ़ावा
इसमें व्यक्ति सिर्फ रीति-रिवाज से पूजा करता है, लेकिन मन में भक्ति नहीं। गीता (7.21) में कहा गया – “यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति…” – भगवान उसी रूप में प्रसन्न होते हैं, जिसमें भक्त श्रद्धा से उन्हें याद करता है।
2. भाव स्तर: हृदय की शुद्धता
यहाँ भक्त फूल चढ़ाते समय भी मन से प्रभु का स्मरण करता है। तुलसीदासजी ने कहा – “भावना ही भगति है, नहिं माला कपूर।”
3. प्रेम स्तर: निस्वार्थ समर्पण
यह सर्वोच्च स्तर है, जैसे प्रह्लाद या ध्रुव की भक्ति। इसमें भक्त भगवान से कुछ नहीं माँगता, सिर्फ प्रेम देता है।
कैसे जागृत करें सच्ची भावना?
1. नाम स्मरण: सबसे सरल साधन
- “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥”
- इस मंत्र का नियमित जप मन को शुद्ध करता है।
2. सेवा भाव: भक्ति का दूसरा नाम
भगवान की मूर्ति के सामने बैठकर उनके चरणों में पुष्प अर्पित करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है – गरीबों को भोजन देना, जरूरतमंदों की मदद करना।
3. सत्संग: भक्ति की अग्नि को प्रज्वलित करें
संतों के प्रवचन सुनने से हृदय में भक्ति का दीपक जल उठता है। कबीरदासजी ने कहा – “सत्संगत मिले कबीरा, उद्धरा संसार।”
प्रेरक प्रसंग: एक फूल वाली की कहानी
एक बार एक गरीब महिला रोज मंदिर में एक फूल चढ़ाती थी। एक दिन उसके पास फूल नहीं था, तो उसने आँसू भरी आँखों से कहा – “प्रभु, आज मेरे पास कुछ नहीं है, बस ये आँसू ले लो।” उसी रात मंदिर के पुजारी ने स्वप्न में देखा कि भगवान ने उस महिला के आँसुओं को अपने मुकुट में सजा लिया है।
भाव ही सर्वोपरि
चाहे हम मंदिर में जाएँ या घर पर पूजा करें – भगवान को हमारी भावना चाहिए, न कि दिखावे की पूजा। जैसा कि संत एकनाथजी ने कहा – “भाव ही भगवान का भोजन है।” आइए, हम सच्चे मन से प्रभु का स्मरण करें, क्योंकि वे वास्तव में फल-फूल नहीं, भाव के भूखे हैं।
ॐ शांति शांति शांति।

