पांडवों को कौरवों पर विजय हनुमानजी की कृपा से मिली थी, जानें इससे जुड़ी कथा
महाभारत का युद्ध न्याय और धर्म की विजय का प्रतीक है। इस युद्ध में पांडवों की विजय के पीछे भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ पवनपुत्र हनुमानजी की कृपा भी छिपी हुई है। क्या आप जानते हैं कि हनुमानजी ने अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान होकर उन्हें विजयश्री दिलाई थी? आइए, इस पावन कथा को विस्तार से जानते हैं।
महाभारत में हनुमानजी का प्राकट्य
रामायण काल के बाद हनुमानजी अमर हो गए और वे धरती पर ही निवास करने लगे। महाभारत काल में जब अर्जुन हिमालय पर भगवान शिव की तपस्या करने गए, तब उनकी मुलाकात हनुमानजी से हुई। इस मिलन के पीछे एक रोचक कथा है:
- अर्जुन ने हनुमानजी से कहा कि वे रामसेतु बनाने वाले वानरों की शक्ति पर संदेह करते हैं।
- इस पर हनुमानजी ने अर्जुन को चुनौती दी कि वे एक छोटी सी पूँछ से भी ऐसा सेतु बना सकते हैं।
- जब अर्जुन ने अपने बाणों से सेतु बनाया, तो हनुमानजी की पूँछ के वजन से वह टूट गया।
- इससे अर्जुन को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने हनुमानजी से क्षमा माँगी।
हनुमानजी का अर्जुन के रथ पर आसीन होना
कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले जब अर्जुन ने हनुमानजी से उनकी कृपा माँगी, तब हनुमानजी ने उन्हें वरदान दिया कि वे उनके रथ की ध्वजा पर विराजमान होंगे। इसके पीछे कई महत्वपूर्ण कारण थे:
- भय निवारण: हनुमानजी की उपस्थिति से अर्जुन का मनोबल बढ़ा और भय दूर हुआ।
- दिव्य सुरक्षा: राक्षसी शक्तियों से रक्षा के लिए हनुमानजी का होना आवश्यक था।
- कृष्ण का वचन: भगवान कृष्ण ने पहले ही भविष्यवाणी की थी कि हनुमानजी अर्जुन की सहायता करेंगे।
युद्ध के दौरान हनुमानजी की भूमिका
महाभारत युद्ध के 18 दिनों तक हनुमानजी ने अर्जुन के रथ पर विराज कर अनेक चमत्कार किए:
- जब कर्ण ने अर्जुन पर नागास्त्र छोड़ा, तो हनुमानजी ने उसे निष्क्रिय कर दिया।
- दुर्योधन के छलपूर्ण हमलों को हनुमानजी ने विफल किया।
- अर्जुन के रथ को भूमि पर टिकाए रखने का श्रेय भी हनुमानजी को जाता है।
हनुमानजी द्वारा भीम को दिया गया उपदेश
महाभारत में एक अन्य प्रसंग है जब भीम और हनुमानजी का मिलन हुआ:
- भीम को अपनी शक्ति पर अभिमान हो गया था।
- हनुमानजी ने एक बूढ़े वानर के रूप में उनकी परीक्षा ली।
- जब भीम हनुमानजी की पूँछ नहीं हटा पाए, तो उन्हें विनम्रता का पाठ मिला।
- इसके बाद हनुमानजी ने भीम को युद्ध के लिए आशीर्वाद दिया।
हनुमानजी की कृपा के प्रमुख साक्ष्य
महाभारत के इन प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि पांडवों की विजय में हनुमानजी का योगदान अद्वितीय था:
- व्यास गीता: महर्षि व्यास ने हनुमानजी की भूमिका का उल्लेख किया है।
- हरिवंश पुराण: इसमें हनुमानजी और अर्जुन के संवाद का वर्णन है।
- भगवद्गीता: श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था – “यदा यदा हि धर्मस्य…” इसका सम्बन्ध हनुमानजी के संकल्प से भी है।
निष्कर्ष
महाभारत की इस पावन कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भक्ति और विनम्रता से जब हनुमानजी प्रसन्न होते हैं, तो वे असंभव को भी संभव कर देते हैं। पांडवों ने धर्म का साथ दिया और हनुमानजी ने उनकी रक्षा की। आज भी जो भक्त श्रद्धा से हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, उन पर हनुमानजी की कृपा बनी रहती है।
जय श्रीराम! जय बजरंगबली!
