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Makar Sankranti 2025 भीष्म पितामह ने क्यों छोड़ा शरीर

भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन ही शरीर त्यागा जानिए इसकी पौराणिक कथा और महत्व 2025 में

Published July 2, 2026
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5 Min Read

मकर संक्रांति का महत्व

मकर संक्रांति हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है, जिसे शुभ और पुण्यकाल माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह ने इसी दिन अपने शरीर का त्याग क्यों किया था? आइए, इस पौराणिक कथा को विस्तार से जानते हैं।

Contents
मकर संक्रांति का महत्वभीष्म पितामह का जीवन परिचयमहाभारत के अद्भुत योद्धाइच्छामृत्यु का वरदानमकर संक्रांति और भीष्म पितामह का संबंधसूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षामकर संक्रांति: मोक्ष का शुभ मुहूर्तपौराणिक कथा: भीष्म पितामह की मृत्यु का रहस्यकुरुक्षेत्र के युद्ध की घटनायुधिष्ठिर से ज्ञान की प्राप्तिमकर संक्रांति पर प्राण त्यागनामकर संक्रांति पर भीष्म पितामह की स्मृतितिल-तर्पण और दान का महत्वमहाभारत के पाठ का विधाननिष्कर्ष: मकर संक्रांति की आध्यात्मिक शिक्षा

—

भीष्म पितामह का जीवन परिचय

महाभारत के अद्भुत योद्धा

भीष्म पितामह, जिनका वास्तविक नाम देवव्रत था, महाभारत के सबसे सम्मानित पात्रों में से एक हैं। वे हस्तिनापुर के सिंहासन के रक्षक और कुरु वंश के पितामह थे। उन्होंने अपने पिता राजा शांतनु की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया और सिंहासन का त्याग किया, जिसके कारण उन्हें “भीष्म” की उपाधि मिली।

इच्छामृत्यु का वरदान

भीष्म पितामह को उनकी तपस्या और निष्ठा के कारण इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसका अर्थ था कि वे अपनी मृत्यु का समय स्वयं चुन सकते थे। महाभारत के युद्ध में वे पांडवों और कौरवों के बीच लड़े, लेकिन अर्जुन के हाथों बाणों की शैय्या पर लेट गए। फिर भी, उन्होंने अपने प्राण तब तक नहीं छोड़े, जब तक सूर्य उत्तरायण नहीं हो गया।

मकर संक्रांति और भीष्म पितामह का संबंध

सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा

महाभारत के युद्ध के दौरान भीष्म पितामह घायल होकर बाणों की शैय्या पर लेट गए। उन्होंने अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य के दक्षिणायन (जुलाई से दिसंबर) के समय मृत्यु होने पर व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त नहीं होता, जबकि उत्तरायण (जनवरी से जून) में प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

मकर संक्रांति: मोक्ष का शुभ मुहूर्त

मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, जिसे उत्तरायण का प्रारंभ माना जाता है। भीष्म पितामह ने इसी पावन अवसर पर अपने प्राण त्यागकर मोक्ष प्राप्त किया। इसीलिए मकर संक्रांति को केवल फसलों का त्योहार नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति और मोक्ष का दिन भी माना जाता है।

पौराणिक कथा: भीष्म पितामह की मृत्यु का रहस्य

कुरुक्षेत्र के युद्ध की घटना

महाभारत के युद्ध के दसवें दिन, भीष्म पितामह ने अर्जुन के सामने अपने अस्त्र त्याग दिए। शिखंडी को सामने रखकर अर्जुन ने उन्हें बाणों से छलनी कर दिया। भीष्म के शरीर से रक्त की धारा बह निकली, लेकिन उन्होंने प्राण नहीं छोड़े।

युधिष्ठिर से ज्ञान की प्राप्ति

जब युधिष्ठिर ने भीष्म से ज्ञान प्राप्त किया, तब उन्होंने बताया कि वे सूर्य के उत्तरायण होने तक प्रतीक्षा करेंगे। उन्होंने कहा –

“उत्तरायणे सूर्यस्य प्रयाति यः शरीरतः।
स गच्छति परं धाम न चेहाऽऽगच्छति पुनः॥”

(महाभारत, शांति पर्व)

अर्थात, जो व्यक्ति सूर्य के उत्तरायण काल में शरीर त्यागता है, वह परम धाम को प्राप्त होता है और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।

मकर संक्रांति पर प्राण त्यागना

अंततः, मकर संक्रांति के दिन भीष्म पितामह ने अपनी इच्छाशक्ति से प्राण त्याग दिए। उनकी यह महान त्याग-गाथा आज भी श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

मकर संक्रांति पर भीष्म पितामह की स्मृति

तिल-तर्पण और दान का महत्व

मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का दान विशेष फलदायी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पितरों को तर्पण देने से उन्हें मोक्ष मिलता है। भीष्म पितामह की स्मृति में भक्तगण:

  • तिल के तेल का दीपक जलाते हैं।
  • गुड़-तिल के लड्डू बांटते हैं।
  • पवित्र नदियों में स्नान करते हैं।

महाभारत के पाठ का विधान

कई घरों में मकर संक्रांति के दिन भीष्म पितामह के जीवन से जुड़े अध्याय पढ़े जाते हैं। विशेष रूप से शांति पर्व का पाठ किया जाता है, जिसमें भीष्म ने युधिष्ठिर को राजधर्म और जीवन के गूढ़ रहस्य बताए थे।

निष्कर्ष: मकर संक्रांति की आध्यात्मिक शिक्षा

भीष्म पितामह की कथा हमें सिखाती है कि मृत्यु भी एक उत्सव हो सकती है, यदि वह धर्म और मोक्ष के मार्ग पर हो। मकर संक्रांति न केवल फसलों का त्योहार है, बल्कि यह आत्मा के उत्थान का भी पर्व है। इस दिन हमें अपने जीवन में सत्य, धर्म और त्याग का पालन करने की प्रेरणा मिलती है।

ॐ शांति: शांति: शांति:॥

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