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Pitru Paksha 2025 10-25 सितंबर श्राद्ध महत्व और जरूरत

पितृपक्ष 2025: 10 से 25 सितंबर तक जानिए श्राद्ध का महत्व और क्यों जरूरी है श्राद्धकर्म। पितरों को श्रद्धांजलि देने का पावन समय।

Published July 2, 2026
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5 Min Read

हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। यह वह समय होता है जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं। 2025 में पितृपक्ष 10 सितंबर से 25 सितंबर तक मनाया जाएगा। इस अवधि में पितरों को तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म से संतुष्ट किया जाता है। आइए, जानते हैं कि पितृपक्ष क्यों महत्वपूर्ण है और श्राद्ध कर्म करना कितना आवश्यक है।

Contents
पितृपक्ष क्या है?पितृपक्ष 2025 की तिथियाँश्राद्ध क्यों जरूरी है?श्राद्ध का महत्वश्राद्ध कैसे करें?श्राद्ध की तैयारीश्राद्ध विधिपितृपक्ष में क्या न करें?पितृपक्ष की कथानिष्कर्ष

पितृपक्ष क्या है?

पितृपक्ष, जिसे महालय पक्ष या श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है, भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। इस दौरान हम अपने पितरों (पूर्वजों) को याद करते हैं और उनकी मोक्ष प्राप्ति के लिए विधि-विधान से श्राद्ध कर्म करते हैं।

पितृपक्ष 2025 की तिथियाँ

  • 10 सितंबर 2025 – पितृपक्ष प्रारंभ (पूर्णिमा श्राद्ध)
  • 11 सितंबर 2025 – प्रतिपदा श्राद्ध
  • 12 सितंबर 2025 – द्वितीया श्राद्ध
  • 13 सितंबर 2025 – तृतीया श्राद्ध
  • 14 सितंबर 2025 – चतुर्थी श्राद्ध
  • 15 सितंबर 2025 – पंचमी श्राद्ध
  • 16 सितंबर 2025 – षष्ठी श्राद्ध
  • 17 सितंबर 2025 – सप्तमी श्राद्ध
  • 18 सितंबर 2025 – अष्टमी श्राद्ध
  • 19 सितंबर 2025 – नवमी श्राद्ध
  • 20 सितंबर 2025 – दशमी श्राद्ध
  • 21 सितंबर 2025 – एकादशी श्राद्ध
  • 22 सितंबर 2025 – द्वादशी श्राद्ध
  • 23 सितंबर 2025 – त्रयोदशी श्राद्ध
  • 24 सितंबर 2025 – चतुर्दशी श्राद्ध
  • 25 सितंबर 2025 – अमावस्या श्राद्ध (सर्वपितृ अमावस्या)

श्राद्ध क्यों जरूरी है?

हिंदू शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य के तीन प्रमुख ऋण होते हैं – देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। इनमें से पितृ ऋण को चुकाने के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्राद्ध नहीं करता, उसके पितर असंतुष्ट रहते हैं और उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है।

श्राद्ध का महत्व

  • पितरों की आत्मा को शांति – श्राद्ध कर्म से पितरों की आत्मा को मोक्ष मिलता है।
  • परिवार की सुख-समृद्धि – संतुष्ट पितर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।
  • कर्मों का फल – श्राद्ध करने से पुण्य प्राप्त होता है और पापों से मुक्ति मिलती है।
  • धार्मिक कर्तव्य – यह हमारा धार्मिक दायित्व है कि हम अपने पूर्वजों का स्मरण करें।

श्राद्ध कैसे करें?

श्राद्ध करने की विधि बहुत ही पवित्र और सरल है। यहाँ श्राद्ध कर्म की सरल विधि बताई जा रही है:

श्राद्ध की तैयारी

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पवित्र वस्त्र धारण करें।
  • श्राद्ध के दिन ब्राह्मण भोजन के लिए आमंत्रित करें।
  • गाय, कुत्ते, कौए और चींटियों के लिए भोजन अलग रखें।

श्राद्ध विधि

  1. सबसे पहले पितरों का आवाहन करें – “ॐ पितृदेवताभ्यो नमः” मंत्र का जाप करें।
  2. तर्पण करें – जल, तिल, चावल और फूल लेकर पितरों को अर्पित करें।
  3. पिंडदान करें – चावल, दूध और घी से बने पिंड को पितरों के नाम पर अर्पित करें।
  4. ब्राह्मण भोजन – ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और दक्षिणा दें।
  5. अंत में पितरों को विदा करें – “ॐ पितृदेवताभ्यो नमः स्वधा” कहकर आशीर्वाद माँगें।

पितृपक्ष में क्या न करें?

पितृपक्ष के दौरान कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:

  • मांस-मदिरा का सेवन न करें – यह पितरों के प्रति अनादर माना जाता है।
  • नए कार्य शुरू न करें – इस समय कोई नया व्यवसाय या शुभ कार्य न करें।
  • क्रोध और झूठ से बचें – पितृपक्ष में मन को शुद्ध रखें।

पितृपक्ष की कथा

महाभारत काल में जब कर्ण की मृत्यु हुई, तो उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुँची। वहाँ उन्हें सोने और रत्नों के अलावा भोजन नहीं मिला। जब उन्होंने इंद्र से पूछा, तो उन्हें बताया गया कि उन्होंने जीवनभर दान तो किया, लेकिन अपने पितरों को कभी भोजन नहीं दिया। तब कर्ण को पृथ्वी पर वापस भेजा गया और 15 दिनों तक उन्होंने अपने पितरों का श्राद्ध किया। इसी कारण इन 15 दिनों को पितृपक्ष कहा जाता है।

निष्कर्ष

पितृपक्ष हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों का हमारे जीवन में कितना महत्व है। श्राद्ध कर्म न केवल उनकी आत्मा की शांति के लिए आवश्यक है, बल्कि यह हमारे लिए भी पुण्य का कार्य है। इसलिए, 10 से 25 सितंबर 2025 तक पितृपक्ष के दौरान श्रद्धापूर्वक श्राद्ध कर्म करें और पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करें।

ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।

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