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रुक्मिणी अष्टमी व्रत महत्व तिथि और पूजा विधि

रुक्मिणी अष्टमी व्रत का महत्व, सही तिथि और आसान पूजा विधि जानें। इस व्रत से पाएं भगवान कृष्ण की कृपा और सुख-समृद्धि। पूरी जानकारी हिंदी में।

Published July 2, 2026
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5 Min Read

रुक्मिणी अष्टमी व्रत: भगवान कृष्ण और रुक्मिणी जी के अटूट प्रेम का प्रतीक

हिंदू धर्म में अष्टमी तिथि का विशेष महत्व है, खासकर भगवान कृष्ण से जुड़े व्रतों में। रुक्मिणी अष्टमी व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है, जो भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी के पवित्र विवाह का स्मरण दिवस है। यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए किया जाता है। आइए जानें इस व्रत का आध्यात्मिक महत्व, पूजन विधि और मंत्रों के बारे में विस्तार से।

Contents
रुक्मिणी अष्टमी व्रत: भगवान कृष्ण और रुक्मिणी जी के अटूट प्रेम का प्रतीकरुक्मिणी अष्टमी व्रत 2024: तिथि और मुहूर्तक्यों मनाई जाती है रुक्मिणी अष्टमी?रुक्मिणी अष्टमी व्रत का महत्वरुक्मिणी अष्टमी व्रत की पूजा विधिव्रत से पहले की तैयारीपूजन सामग्रीविस्तृत पूजा विधिविशेष मंत्र और आरतीरुक्मिणी अष्टमी व्रत कथाव्रत के नियम और सावधानियांरुक्मिणी अष्टमी व्रत का पारणनिष्कर्ष

रुक्मिणी अष्टमी व्रत 2024: तिथि और मुहूर्त

इस वर्ष रुक्मिणी अष्टमी 30 अगस्त 2024, शुक्रवार को मनाई जाएगी।

  • अष्टमी तिथि प्रारंभ: 29 अगस्त 2024 को रात 09:14 बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त: 30 अगस्त 2024 को रात 10:52 बजे
  • व्रत पारण समय: 30 अगस्त को सूर्योदय के बाद

क्यों मनाई जाती है रुक्मिणी अष्टमी?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान कृष्ण ने विदर्भ नरेश की पुत्री रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह किया था। रुक्मिणी जी को लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। यह व्रत दांपत्य जीवन में प्रेम, समर्पण और एकता का संदेश देता है।

रुक्मिणी अष्टमी व्रत का महत्व

इस व्रत का वर्णन भविष्य पुराण और स्कन्द पुराण में मिलता है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से यह व्रत रखते हैं, उन्हें यश, धन और सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है।

  • पति की दीर्घायु और स्वास्थ्य के लिए शुभ माना जाता है
  • कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है
  • पारिवारिक कलह दूर होती है
  • भगवान कृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है

रुक्मिणी अष्टमी व्रत की पूजा विधि

व्रत से पहले की तैयारी

  • सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें
  • साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें (पीले या लाल रंग को शुभ माना जाता है)
  • पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें
  • लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं

पूजन सामग्री

  • श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी की मूर्ति/तस्वीर
  • पीले फूल, तुलसी दल
  • घी का दीपक, धूप, अगरबत्ती
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • माखन-मिश्री, फल, मेवा

विस्तृत पूजा विधि

  1. सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें
  2. कृष्ण-रुक्मिणी की प्रतिमा स्थापित करें
  3. घी का दीपक जलाएं और धूप दिखाएं
  4. पंचामृत से अभिषेक करें
  5. पीले फूल, तुलसी अर्पित करें
  6. माखन-मिश्री का भोग लगाएं
  7. नीचे दिए मंत्रों का जाप करें

विशेष मंत्र और आरती

मूल मंत्र:
“ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे, रुक्मिणी वल्लभाय धीमहि, तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्”

स्तुति मंत्र:
“यया हि सा रुक्मिणी नाम कृष्णेन सह मोदते।
तस्यै नमोस्तु भद्रं ते पत्नीं तां पतिदेवताम्॥”

रुक्मिणी अष्टमी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, रुक्मिणी विदर्भ राज्य की राजकुमारी थीं जो भगवान कृष्ण से विवाह करना चाहती थीं। लेकिन उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया। तब रुक्मिणी ने कृष्ण को पत्र भेजकर सहायता मांगी। कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण कर भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के दिन उनसे विवाह किया। यह दिन प्रेम और साहस की मिसाल बन गया।

व्रत के नियम और सावधानियां

  • पूरे दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखें
  • क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से बचें
  • गरीबों को भोजन या दान अवश्य दें
  • रात को हल्का सात्विक भोजन ग्रहण करें
  • पति-पत्नी साथ बैठकर भोजन करें

रुक्मिणी अष्टमी व्रत का पारण

अगले दिन सूर्योदय के बाद स्नान करके भगवान कृष्ण को याद करते हुए व्रत खोलें। पहले गंगाजल पीकर फिर फलाहार करें। मान्यता है कि इस व्रत को करने से स्त्रियों को सौभाग्य की प्राप्ति होती है और पारिवारिक जीवन सुखमय बनता है।

निष्कर्ष

रुक्मिणी अष्टमी व्रत भगवान कृष्ण और देवी रुक्मिणी के पवित्र प्रेम का स्मरण कराता है। यह व्रत दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण को मजबूत करता है। सच्चे मन से इस व्रत को करने वाले भक्तों पर श्रीकृष्ण की विशेष कृपा बनी रहती है। आप सभी को रुक्मिणी अष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

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