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शिव और कृष्ण में छिड़ा संग्राम Shiv Krishna Yudh

Published September 28, 2025
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4 Min Read

दो देवताओं का अद्भुत संग्राम

हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथों में देवताओं के बीच हुए संघर्षों के कई प्रसंग मिलते हैं, लेकिन भगवान शिव और भगवान कृष्ण के बीच हुआ युद्ध एक अनोखी और रोमांचक घटना है। यह संग्राम न सिर्फ शक्ति और बुद्धि का टकराव था, बल्कि इसमें दोनों देवताओं की दिव्य लीलाओं का भी दर्शन होता है। आइए, जानते हैं कि कैसे यह युद्ध शुरू हुआ और किसने जीता?

Contents
दो देवताओं का अद्भुत संग्रामसंग्राम का कारण: क्यों लड़े शिव और कृष्ण?युद्ध की शुरुआत: कैसे टकराए त्रिलोकनाथ और योगेश्वर?शिव का रौद्र रूपकृष्ण की चतुराईसंग्राम का अंत: किसने जीता?शिक्षा: दोनों देवताओं की एकतामंत्र और भक्तिभक्ति ही सच्ची विजय

संग्राम का कारण: क्यों लड़े शिव और कृष्ण?

पुराणों के अनुसार, एक बार भगवान कृष्ण द्वारका में विराजमान थे। उसी समय वहाँ देवर्षि नारद पधारे और उन्होंने कृष्ण से कहा – “हे माधव, आप तो सर्वशक्तिमान हैं, लेकिन क्या आपने कभी भगवान शिव की शक्ति का सामना किया है?” नारद जी के इन शब्दों ने कृष्ण के मन में जिज्ञासा जगा दी।

  • नारद की चुनौती: नारद ने कृष्ण को बताया कि शिव के पास पाशुपत अस्त्र है, जो अजेय है।
  • कृष्ण की प्रतिक्रिया: श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा – “चलो, तो फिर देखते हैं!”

युद्ध की शुरुआत: कैसे टकराए त्रिलोकनाथ और योगेश्वर?

भगवान कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र को धारण किया और कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर उन्होंने भगवान शिव का आह्वान किया। शिव जी ने जब देखा कि स्वयं श्रीकृष्ण उनसे युद्ध के लिए आए हैं, तो वे भी तैयार हो गए।

शिव का रौद्र रूप

भगवान शिव ने अपना वीरभद्र रूप धारण किया और अपने त्रिशूल को उठा लिया। उनके गले से निकलने वाला “हुंकार” पूरे ब्रह्मांड में गूँज उठा। देवताओं ने देखा कि दोनों ही अजेय हैं – एक ओर संहारक शिव, तो दूसरी ओर पालनहार कृष्ण।

कृष्ण की चतुराई

युद्ध के दौरान शिव ने अपना पाशुपत अस्त्र छोड़ा, जिसे रोक पाना असंभव था। लेकिन कृष्ण ने अपनी योगमाया से उस अस्त्र को निष्क्रिय कर दिया। फिर उन्होंने सुदर्शन चक्र को छोड़ा, जिससे शिव के त्रिशूल और चक्र के बीच भयंकर टकराव हुआ।

संग्राम का अंत: किसने जीता?

जब युद्ध अपने चरम पर पहुँचा, तो ब्रह्मा जी और देवर्षि नारद ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने दोनों देवताओं से कहा – “आप दोनों ही सर्वशक्तिमान हैं, इसलिए इस संघर्ष का कोई अंत नहीं होगा।”

  • शिव की प्रशंसा: शिव ने कृष्ण की बुद्धिमत्ता और शक्ति की सराहना की।
  • कृष्ण का विनम्रता: श्रीकृष्ण ने शिव को प्रणाम किया और कहा – “आप ही आदि देव हैं, मैं तो केवल आपकी लीला का हिस्सा हूँ।”

शिक्षा: दोनों देवताओं की एकता

इस संग्राम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शिव और कृष्ण एक ही परम सत्ता के दो रूप हैं। शिव संहारक हैं, तो कृष्ण पालनहार। दोनों ही भक्तों के रक्षक हैं और उनकी लीलाएँ अद्भुत हैं।

मंत्र और भक्ति

इस प्रसंग को याद करते हुए भक्त यह मंत्र पढ़ सकते हैं:

“ॐ नमः शिवाय” (शिव का पावन मंत्र)
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” (कृष्ण का मंत्र)

भक्ति ही सच्ची विजय

इस युद्ध का वास्तविक उद्देश्य यही था कि भक्तों को समझाया जाए कि ईश्वर एक है, चाहे वह शिव के रूप में हो या कृष्ण के। असली जीत भक्ति की होती है, जो हमें दोनों देवताओं के करीब ले जाती है।

आप इस कथा को अपने मन में संजोएँ और भगवान शिव तथा श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन हो जाएँ। हर हर महादेव! गोविन्द गोपाल!

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