मनुस्मृति और मानवीय संबंध
मनुस्मृति, जिसे मानव धर्मशास्त्र भी कहा जाता है, हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन और प्रमाणिक ग्रंथों में से एक है। इसमें मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं—धर्म, नीति, समाज और संबंधों—का विस्तृत विवेचन किया गया है। आज के इस लेख में हम जानेंगे कि मनुस्मृति स्त्री-पुरुष संबंधों को कैसे देखता है और इन संबंधों में संतुलन व सम्मान क्यों आवश्यक है।
मनुस्मृति में स्त्री और पुरुष की भूमिका
1. पारस्परिक सम्मान का सिद्धांत
मनुस्मृति के अध्याय 3, श्लोक 56 में कहा गया है:
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”
अर्थात: “जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।” यह श्लोक स्पष्ट करता है कि स्त्री-पुरुष संबंधों में समानता और आदर का होना कितना महत्वपूर्ण है।
2. पूरकता का दर्शन
मनुस्मृति में स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। जैसे:
- पुरुष को समाज की रक्षा और धर्म के पालन का दायित्व दिया गया है।
- स्त्री को घर-परिवार की धुरी और संस्कारों की संरक्षिका माना गया है।
दोनों की भूमिकाएँ अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे के बिना अधूरी हैं।
विवाह और पारिवारिक जीवन
1. विवाह के आठ प्रकार
मनुस्मृति (अध्याय 3, श्लोक 20-34) में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं:
- ब्रह्म विवाह: वेदज्ञ ब्राह्मण को कन्या दान।
- दैव विवाह: यज्ञकर्ता को कन्या देना।
- आर्ष विवाह: गौ-दान के बदले कन्या देना।
- प्रजापत्य विवाह: धर्मपालन हेतु विवाह।
- गंधर्व विवाह: प्रेम विवाह (परस्पर सहमति)।
- आसुर विवाह: धन देकर कन्या प्राप्त करना।
- राक्षस विवाह: बलपूर्वक हरण कर विवाह।
- पैशाच विवाह: छल या अज्ञानता में विवाह।
इनमें ब्रह्म, दैव, आर्ष और प्रजापत्य विवाह को श्रेष्ठ माना गया है।
2. पत्नी का स्थान
मनुस्मृति (अध्याय 9, श्लोक 26) में कहा गया है:
“पत्नी भार्या गृहिणी सहधर्मचारिणी।
सखी च प्रियतमा च मनोरञ्जनकारिणी॥”
अर्थात: “पत्नी गृहिणी, धर्म की सहचरी, सखी और मन को प्रसन्न करने वाली होती है।” यहाँ पत्नी को केवल सेविका नहीं, बल्कि जीवनसंगिनी माना गया है।
धर्म और कर्तव्य
1. पति-पत्नी के कर्तव्य
मनुस्मृति के अनुसार:
- पति का कर्तव्य: पत्नी की रक्षा करना, उसके सुख-दुःख में साथ देना और धर्म के मार्ग पर चलना।
- पत्नी का कर्तव्य: घर-परिवार का पालन-पोषण, संतानों को संस्कार देना और पति के साथ धर्मपूर्वक जीवन बिताना।
2. संयम और नैतिकता
अध्याय 5, श्लोक 154 में कहा गया है:
“स्त्रीणां रक्षणं कुर्वीत पुरुषः स्वयमेव हि।
रक्षिता रक्ष्यते धर्मे धर्मो रक्षति रक्षितः॥”
अर्थात: “पुरुष को स्त्री की रक्षा स्वयं करनी चाहिए। रक्षा करने वाला धर्म द्वारा रक्षित होता है और धर्म उसकी रक्षा करता है।” यहाँ “रक्षा” का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं, बल्कि सम्मान और नैतिक बल भी है।
आधुनिक संदर्भ में मनुस्मृति
आज के युग में मनुस्मृति के सिद्धांतों को संदर्भानुसार समझना चाहिए। जैसे:
- समानता: आज स्त्री-पुरुष दोनों शिक्षा, व्यवसाय और समाज में समान भूमिका निभाते हैं।
- सहयोग: पति-पत्नी का संबंध अब “स्वामी-सेविका” नहीं, बल्कि साझेदारी पर आधारित है।
निष्कर्ष: संतुलन ही सार है
मनुस्मृति स्त्री-पुरुष संबंधों में संतुलन, सम्मान और धर्म को सर्वोपरि मानती है। आज भी इन सिद्धांतों को अपनाकर हम स्वस्थ और सुखी पारिवारिक जीवन जी सकते हैं।
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
(मनुस्मृति 8.15)
अर्थात: “धर्म का नाश करने वाले का नाश होता है और धर्म की रक्षा करने वाले की रक्षा होती है।”
इस लेख को पढ़कर आपने जाना कि मनुस्मृति स्त्री-पुरुष संबंधों को कितने गहन और संतुलित दृष्टिकोण से देखती है। इन सिद्धांतों को आत्मसात कर हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।
|| हरि ॐ तत्सत् ||
नोट: मनुस्मृति के श्लोकों का हिंदी अनुवाद सरलता हेतु किया गया है। मूल संस्कृत श्लोकों की शुद्धता के लिए विद्वानों से सत्यापन आवश्यक है।

